बहराइच के जंगलों में मिलने वाली इन चीजों से तैयार होती हैं खास प्रोडक्ट, बाजार में डिमांड
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बहराइच का कतर्नियाघाट जंगल, जिसके किनारे जिले के कई गांव बसे हुए है. जहा के रहने वाले लोग जंगल की वेस्टज चीजो जैसे घास,जलकुंभी, मूंज आदि वेस्टज प्राकृतिक चीजों से उपयोगी मनमोहके सामग्री बना कर सुर्खियां बटोर,अच्छी कमाई कर रही है. जिसमें रोटी रखने का बॉक्स, धूप से बचने के लिए कैप घर के डेकोरेटिव आइटम,बैग,डलिया और भी कई चीज बनाकर तैयार कर रही है.
बहराइच ही नहीं वैसे तो लगभग-लगभग पूरे भारत के अधिकांश जंगलों में मूंज नामक घास पाई जाती है. जिस घास का इस्तेमाल बहराइच जिले के जंगल किनारे बसे गांव में रहने वाली थारू जनजाति की महिलाएं विभिन्न सामग्री बनाने में करती हैं। जैसे रोटी बॉक्स फूल या सजाने के लिए पॉट,और भी बहुत कुछ जिसको बनाने के लिए सबसे पहले महिलाएं जंगलों से इन घासो को काटकर लाकर सुखाकर अच्छे से सफाई करती हैं और फिर पानी में भिगोकर इसकी बिनाई और कलर करती हैं.

एक वक्त ऐसा था जब केन फर्नीचर का लोग नाम भी नहीं जानते थे, लेकिन बदलते वक्त के साथ-साथ या इतना प्रचलित हुआ कि आज भारत के कोने-कोने में इसकी कुर्सियां, टेबल, झूले सजावट के आइटम समेत कई चीज बनाकर तैयार की जा रही है. यह एक जंगल में स्वतः उगने वाला पौधा होता है जो जंगल झाड़ियों में बड़े-बड़े पेड़ों के ऊपर जमीन से चढ़ जाता है. जिसको काटकर लाकर सुखाकर आकार देकर मनमोहक कुर्सी, डाइनिंग टेबल जैसी चीज बनाई जाती है जिसकी अब डिमांड भी खूब हो रही है और लोग इसका इस्तेमाल करके खूब पैसे भी कमा रहे हैं.

बहराइच जिले के मिहिपुरवा क्षेत्र जो की जंगल से सटा हुआ क्षेत्र है, जहां के गांव में रहने वाली महिलाएं जंगल के विभिन्न चीजों से सामग्री बनाने के साथ-साथ नदी में पाई जाने वाली जलकुंभी से भी कई तरह के आइटम बनाकर तैयार करती हैं. जिसमें खासकर गर्मी से बचने के लिए रूसी टोपी जिसको गर्मी में लगाने पर काफी राहत मिलती है. यह धूप को सीधे तौर पर कंट्रोल कर लेता है, सर ठंडा बना रहता है.
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ग्रामीण इलाकों में या जंगल वाले इलाकों में पड़ने वाले नदी, तालाब में अब लोग रोजगार के लिए कमल की खेती करने लगे हैं. जिसमें फल फूल का इस्तेमाल तो लंबे समय से होते आ रहा है। लेकिन अब महिलाएं इसके तने का भी इस्तेमाल करके आत्मनिर्भर बन रही है और अच्छा पैसा कमा रही हैं. इसके सामग्री की बात करें तो इसके तने को लाकर सूखाने के बाद बीन कर इसकी तरह-तरह के डेकोरेटिव आइटम बैग आदि बनाए जा रहे है.

बहराइच के इस जंगल से सटे हुए इलाके में रहने वाली महिलाओं ने न सिर्फ जंगल में पाई जाने वाली चीजों को रोजगार के रूप में इस्तेमाल किया है, बल्कि अब वह आगे बढ़कर केले के वेस्टेज तने को जिसको लोग खराब समझ कर फेंक देते हैं. अब उससे भी तरह-तरह की चीज बनाकर तैयार कर रही हैं। केला होने के बाद जब तने को फेंक दिया जाता है तब या उस तने को लाकर उसकी सफाई करके और सुखाकर मनमोहके चीज बनती हैं इसमें कई चीजे शामिल हैं. जैसे डलिया, डेकोरेटिव आइटम और भी बहुत कुछ जो काफी टिकाऊ भी होता है। और नष्ट होने के बाद भी वातावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है.

बदलते वक्त के साथ-साथ अब लोग बाँस के विभिन्न तरह की सामग्री बनाकर तैयार कर रहे हैं, लेकिन जंगल किनारे क्षेत्र में रहने वाली महिलाएं इन दिनों जंगली बाँस से गर्मी से बचने के लिए हाथ पंखा बनाकर तैयार कर रही है और अच्छा पैसा कमा रही हैं. जिनको बनाने के लिए खोखला बाँस को लाकर फिर बीच से सावधानी से फाड़कर कई हिस्सों में बाटकर इसका हाथ पंखा बनाया जाता है और फिर अच्छे दामों पर बेचकर महिलाएं आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ अपने हुनर को भी निखार रही हैं.

बहराइच में गेहूं के डंठल को वन जिला वन प्रोडक्ट में शामिल किया गया है जिसकी शुरुआत गांव से ही हुई थी. थारू जनजाति की महिलाओं ने गेहूं के डंठल की मनमोहक कलाकृतियां बनाना शुरू किया जिसके बाद धीरे-धीरे यह इतना प्रचलित हुई कि सरकार ने इसको वन जिला वन प्रोडक्ट का दर्जा दिया. आज गांव देहात समेत तमाम महिलाएं गेहूं के डेंटल से तरह-तरह की सामग्री बनाकर अच्छा पैसा कमा रही है और जिले के साथ-साथ पूरे प्रदेश का नाम रोशन कर रही है.

थारू जनजाति की महिलाएं न सिर्फ जंगल में पाई जाने वाली वेस्टज चीजों को बनाकर बिक्री कर आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ अपने खेतों में उगने वाले अनाज के वेस्टेज से भी कमाल दिखा रही है. जिसमें थारू जनजाति की महिलाएं अरहर की खेती करने के बाद बचे हुए अवशेष डंठल को विभिन्न सामग्री बनाने में इस्तेमाल कर लेती है जो देखने में सुंदर मनमोहक और काफी टिकाऊ भी होती है इस तरह महिलाएं जंगल की तमाम चीजों से यूजफुल वस्तुएं बनाकर अच्छा पैसा कमा रही है.