राम मंदिर दान चोरी केस: क्या आरोपियों को नहीं मिलेगा वकील? क्‍या कहता है कानून

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राम मंदिर दान चोरी केस: क्या आरोपियों को नहीं मिलेगा वकील? क्‍या कहता है कानून


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राम मंदिर दान चोरी केस: क्या आरोपियों को नहीं मिलेगा वकील? क्‍या कहता है कानून

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Ram Mandir Daan Chori Case Latest Update: अयोध्या राम मंदिर दान घोटाले के आरोपियों का केस लड़ने से अयोध्या बार एसोसिएशन ने इनकार किया था. पर ऐसे केस में सुप्रीम कोर्ट से लेकर संव‍िधान में क्‍या कहा गया है जानें व‍िशेषज्ञों के मुताबिक अदालत लीगल एड से वकील दिलाने की जिम्मेदार है या नहीं…

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राम मंद‍िर चंदा चोरी मामले में क्‍या आरोपि‍यों को नहीं म‍िलेगा कोई वकील (फोटो: AI)

नई द‍िल्‍ली. अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित गड़बड़ी के मामले में गिरफ्तार आरोपियों को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अयोध्या बार एसोसिएशन ने आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ने का फैसला किया है। इसके बाद सवाल उठ रहा है कि अगर कोई वकील पैरवी करने से इनकार कर दे तो क्या आरोपी को कानूनी मदद से वंचित किया जा सकता है?

कानून के जानकारों के मुताबिक, किसी भी आरोपी को न्याय पाने और अपना पक्ष रखने का संवैधानिक अधिकार हासिल है. अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो अदालत किसी व्यक्ति को बिना बचाव के सजा नहीं दे सकती.

संविधान देता है वकील चुनने का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22(1) हर व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील के जरिए अपना बचाव करने का अधिकार देता है. इसके अलावा संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के सामने समानता की बात करता है जबकि अनुच्छेद 39A सभी को समान न्याय और जरूरतमंदों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था करता है. यानी अगर किसी आरोपी को निजी वकील नहीं मिलता है तो अदालत की जिम्मेदारी होती है कि उसे कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए.

पहले भी कई मामलों में हुआ वकीलों का विरोध
देश में यह पहली बार नहीं है जब किसी मामले में बार एसोसिएशन ने आरोपी की पैरवी करने से इनकार किया हो. निर्भया गैंगरेप केस, मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब का मामला, संसद हमले के दोषी अफजल गुरु का मामला और कठुआ रेप केस जैसे मामलों में भी कई बार वकीलों के विरोध की स्थिति सामने आई थी. हालांकि न्यायिक प्रक्रिया के तहत बाद में आरोपियों को कानूनी सहायता के जरिए वकील उपलब्ध कराए गए ताकि मुकदमे की सुनवाई निष्पक्ष तरीके से हो सके.

सुप्रीम कोर्ट ने बार के ऐसे प्रस्तावों पर क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने एएस मोहम्मद रफी बनाम तमिलनाडु सरकार मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा था कि बार एसोसिएशन का किसी आरोपी का केस नहीं लड़ने का सामूहिक फैसला उचित नहीं है. कोर्ट ने कहा था कि वकीलों का कर्तव्य है कि वे कानून के शासन और न्याय व्यवस्था को मजबूत करें. किसी आरोपी ने कितना भी गंभीर अपराध क्यों न किया हो उसे अपना पक्ष रखने का अधिकार है. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि ऐसे प्रस्ताव पेशेवर जिम्मेदारियों और वकीलों की आचार संहिता के खिलाफ हो सकते हैं.

क्या वकील किसी भी केस को लेने से मना कर सकता है?
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार, वकील के पास किसी केस को स्वीकार करने या न करने का अधिकार होता है लेकिन किसी आरोपी को सिर्फ सामाजिक दबाव या विरोध के कारण कानूनी सहायता से वंचित नहीं किया जा सकता. अगर किसी आरोपी को निजी वकील नहीं मिलता है तो अदालत लीगल एड के माध्यम से उसे वकील उपलब्ध करा सकती है.

अयोध्या मामले में आगे क्या?
अयोध्या राम मंदिर दान मामले में आरोपियों की कानूनी लड़ाई अब इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है कि क्या बार एसोसिएशन के फैसले के बावजूद उन्हें अदालत में अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा? कानूनी विशेषज्ञों की मानें तो न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यही है कि हर आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार मिले. अदालत का काम यह तय करना है कि आरोप साबित होते हैं या नहीं लेकिन उससे पहले आरोपी को अपना बचाव करने का पूरा अवसर मिलना जरूरी है.

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अरुण बिंजोला

अरुण ब‍िंजोला इस वक्‍त न्‍यूज 18 में बतौर एसोसिएट एड‍िटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. वह करीब 15 सालों से पत्रकार‍िता में सक्र‍िए हैं और प‍िछले 10 सालों से ड‍िजिटल मीड‍िया में काम कर रहे हैं. करीब एक साल से न्‍यूज 1…और पढ़ें



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