20 हजार लागत, 2 लाख मुनाफा…किसानों की किस्मत बदल रही ये घास, रोकती है मिट्टी का कटाव
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Khus Farming : खस को दलदली, बंजर और बाढ़ वाली जमीन पर भी इसे आसानी से उगाया जा सकता है. यह एक औषधीय और सुगंधित फसल है, जिसकी जड़ों से निकलने वाले तेल की भारी मांग रहती है. मुरादाबाद के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दीपक मेहंदी रत्ता लोकल 18 से बताते हैं कि इसकी खेती में प्रति एकड़ 20,000 से 30,000 तक की लागत आती है. अच्छी पैदावार मिलने पर 1 लाख से 2 लाख तक का मुनाफा आराम से हो जाता है. एक बार पौधा लग जाने के बाद खेत में कितना भी पानी भर जाए खस खराब नहीं होती है. खस की असली कमाई इसकी जड़ों से है. इसका तेल परफ्यूम और आयुर्वेदिक दवाइयों में इस्तेमाल होता है.
मुरादाबाद. खस (वेटिवर) की खेती किसानों के लिए कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली विकल्प बनती जा रही है. यह एक औषधीय और सुगंधित फसल है, जिसकी जड़ों से निकलने वाले तेल की देश-विदेश में भारी मांग रहती है. इसकी खेती में प्रति एकड़ 20,000 से 30,000 तक की लागत आती है. जबकि अच्छी पैदावार मिलने पर 1 लाख से 2 लाख रुपये तक का मुनाफा कमाया जा सकता है. खस की फसल कम देखभाल में तैयार हो जाती है. इसकी जड़ें इत्र, दवाइयों, सौंदर्य प्रसाधनों और सुगंधित उत्पादों में उपयोग की जाती हैं.
कब करें खेती
मुरादाबाद के कृषि वैज्ञानिक डॉ. दीपक मेहंदी रत्ता लोकल 18 से बताते हैं कि खस की खेती उन जगहों के लिए सबसे अच्छी है जहां पानी लगा रहता है या नदी-किनारे की जमीन हो. दलदली, बंजर और बाढ़ वाली जमीन पर भी इसे आसानी से उगाया जा सकता है. इसे मुख्य रूप से मानसून के समय लगाया जाता है. एक बार पौधा लग जाने के बाद खेत में कितना भी पानी भर जाए खस खराब नहीं होती है. इसकी जड़ें मजबूती से जमीन को पकड़ लेती हैं. खस की असली कमाई इसकी जड़ों से है. जड़ों से निकाला गया तेल बहुत कीमती होता है. यही तेल परफ्यूम, इत्र और आयुर्वेदिक दवाइयों में इस्तेमाल होता है.
अगरबत्ती से सजावटी सामान तक
डॉ. दीपक मेहंदी रत्ता के मुताबिक, इसकी बाजार में हमेशा मांग रहती है. इसके पौधे के ऊपर जो घास निकलती है, उसे कूलर में लगाया जाता है. खस की जड़ें बहुत गहरी जाती हैं, इसलिए ये नदी किनारे और ढलान वाली जमीन पर मिट्टी के कटाव को रोकने का काम भी करती हैं. इस घास से अगरबत्ती और सजावटी सामान बनाकर भी किसान भाई अतिरिक्त आय ले सकते हैं. बाढ़ग्रस्त किसानों के लिए इसकी वरदान से कम नहीं.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें