सहारनपुर का वो काला दिन, जिसे याद कर आज भी डर से कांप जाते हैं व्यापारी
Last Updated:
Saharanpur News: सहारनपुर में जमीन के एक छोटे से टुकड़े को लेकर दो समुदाय के लोगों में संघर्ष हुआ था और दिनदहाड़े व्यापारियों की दुकान लूटने के साथ आग के हवाले की गई थी. वह दिन जब भी हर साल आता है, दोबारा से व्यापारियों के वह जख्म हरे हो जाते हैं.
सहारनपुर: 2014 में अगस्त महीने में सहारनपुर में वह काला दिन आज तक व्यापारियों के जहन से निकलने का नाम नहीं ले रहा है. जब सहारनपुर में जमीन के एक छोटे से टुकड़े को लेकर दो समुदाय के लोगों में संघर्ष हुआ था और दिनदहाड़े व्यापारियों की दुकान लूटने के साथ आग के हवाले कर दिया गया था. वह दिन जब भी प्रत्येक वर्ष आता है, दोबारा से व्यापारियों के जख्म हरे हो जाते हैं.
व्यापारी उन यादों को भूलने की कोशिश भी करते हैं. खास बात यह है कि आज तक उन व्यापारियों को न्याय नहीं मिल पाया है. उसी को लेकर सहारनपुर के व्यापारी ने भावुक होते हुए अपनी दास्तान सुनाई है. चावला इलेक्ट्रॉनिक्स के मालिक बलजीत चावला ने लोकल 18 से बात करते हुए बताया कि अगर आज भी हम 2014, 26 जुलाई की बात करते हैं तो कहीं ना कहीं उस बात को याद कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, क्योंकि सपने में भी हम यह नहीं सोच सकते थे कि इस तरह सब कुछ जलकर खाक हो जाएगा.
दुकान को कर दिया आग के हवाले
उन्होंने कहा कि 25 जुलाई 2014 को हम सही सलामत शटर बंद करके अपने घर गए और 26 जुलाई को जब हम सुबह अपनी दुकान पर आते हैं, तो पूरा का पूरा शोरूम आग की लपटों से घिरा हुआ मिलता है. अगर अंबाला रोड की बात करें तो लगभग 60 से 65 दुकानों का नुकसान हुआ था, जिसमें ना सिर्फ दंगाइयों ने उन दुकानों को लूटा था, बल्कि आग के हवाले तक कर दिया था, जिसमें कुछ भी नहीं बचा था.
व्यापारी ने बताया कि नुकसान इतना हुआ था कि दो मंजिला हमारा शोरूम जलकर खाक हो गया था. इसमें लूट के बाद आग लगा दी गई थी और लगभग 10 से 12 घंटे तक लगातार जलता रहा. राख के शिवाय इस शोरूम में कुछ नहीं बचा था. पिछले 12 वर्षों में निश्चित तौर पर समाज के सहयोग से अपने कस्टमर के सहयोग से दंगों की आंच से हम काफी हद तक उभर चुके हैं.
आज भी थर्रा जाते हैं सहारनपुर के व्यापारी
व्यापारियों ने कहा कि उस मंजर को भूलने की कोशिश करते हैं, लेकिन भूला नहीं पाते हैं. इसके सिवाय हमारे पास कोई और चारा भी नहीं है. हमेशा हम लोग भूतकाल में नहीं जी सकते. आशा के साथ आपको भविष्य की ओर तो देखना ही है. हम लोग निश्चित तौर पर अपने ग्राहकों, समाज, अपने परिवार और स्टाफ के सहयोग से फाइनेंशली अगर कहे तो निश्चित तौर पर उभर चुके हैं, लेकिन कहीं ना कहीं आज भी 26 जुलाई 2014 का वह मंजर जब सामने आता है, तो जख्म हरे हो जाते हैं. आज भी उन यादों के साए से हम नहीं निकाल पाते. अपने सामने 25 वर्षों की मेहनत से खड़ा किया हुआ शोरूम हमने उसको मिट्टी में बदलते हुए देखा है. भावनात्मक रूप से तो उस घटना की आज भी कहीं ना कहीं याद आती, तो हम लोग डर जाते हैं.
About the Author
आर्यन सेठ, News18 Hindi में डिजिटल डेस्क पर जुड़े हैं और जनवरी 2026 से उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध, प्रशासन, वायरल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर खबरें लिखते हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ल…
और पढ़ें