धान के खेत से निकाला है बारिश पानी? फसल बचाने के लिए तुरंत करें ये 2 काम

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धान के खेत से निकाला है बारिश पानी? फसल बचाने के लिए तुरंत करें ये 2 काम


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धान के खेत से निकाला है बारिश पानी? फसल बचाने के लिए तुरंत करें ये 2 काम

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Paddy Farming Tips : बरसात का मौसम चल रहा है. बारिश की वजह से कई जगहों पर खेत पानी से फुल हो चुके हैं. धान किसानों के लिए ये स्थिति चिंता पैदा करने वाली है. लोकल 18 से शाहजहांपुर कृषि वैज्ञानिक डॉ. हादी हुसैन बताते हैं कि धान के खेत में लंबे समय तक पानी भरा रहने से पौधों का विकास रुक जाता है. जलभराव वाली मिट्टी में अक्सर जिंक की कमी हो जाती है, जिससे पत्तियों में पीलापन आने लगता है. उधर, खेत से बारिश का अतिरिक्त पानी बाहर निकालते ही पानी के साथ खेत में मौजूद नाइट्रोजन बह जाता है या निचले स्तरों में चला जाता है. दोनों ही स्थिति किसानों के लिए घातक है. हालांकि पानी निकालने के बाद जल्दबाजी में अत्यधिक उर्वरकों का इस्तेमाल न करें.

डॉ. हादी हुसैन बताते हैं कि खेत से बारिश का अतिरिक्त पानी बाहर निकालते ही मिट्टी धीरे-धीरे हवा के संपर्क में आती है. जलभराव के दौरान जड़ों को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिससे उनकी अवशोषण क्षमता कमजोर पड़ जाती है. पानी घटने के बाद मिट्टी में फिर से हवा का प्रवाह शुरू होता है. यह सही समय होता है जब किसान पौधों की स्थिति का निरीक्षण करें और उन्हें पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया तेजी से शुरू करें.

पानी के साथ खेत में मौजूद नाइट्रोजन बह जाता है या निचले स्तरों में चला जाता है. इसलिए पानी निकालने के बाद पौधों को तुरंत नाइट्रोजन की जरूरत होती है. हालांकि, इस समय भारी मात्रा में खाद डालने से बचें. यूरिया की हल्की खुराक देने से पौधे बिना किसी तनाव के आसानी से पोषण ग्रहण कर लेते हैं और उनमें फिर से नए कल्ले निकलने की प्रक्रिया शुरू होती है.

जलभराव वाली मिट्टी में अक्सर जिंक की कमी हो जाती है, जिससे पत्तियों में पीलापन आने लगता है. जल निकासी के बाद यूरिया के साथ जिंक सल्फेट का छिड़काव बेहद फायदेमंद साबित होता है. जिंक पौधों में क्लोरोफिल के निर्माण को तेज करता है. इससे पत्तियों का हरा रंग वापस लौटता है और पौधा प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को दोबारा प्रभावी ढंग से शुरू कर पाता है.

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लगातार नमी और जलभराव के कारण धान के खेत में फंगस पनपने की संभावना काफी बढ़ जाती है. पानी हटने के बाद भी तने और पत्तियों के आसपास नमी बनी रहती है, जो शीथ ब्लाइट और जड़ सड़न जैसी बीमारियों को न्योता देती है. समय रहते ध्यान न देने पर फफूंद का संक्रमण तेजी से पूरे खेत में फैल सकता है, जिससे भारी नुकसान होता है.

फंगल संक्रमण से बचाव के लिए सही फंगीसाइड का चुनाव और छिड़काव बहुत जरूरी है. जल निकासी के तुरंत बाद जब पत्तियों से अतिरिक्त पानी सूख जाए, तब अनुशंसित फफूंदनाशक का प्रयोग करें. यह पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और बीमारियों के शुरुआती लक्षणों को ही रोक देता है. रोकथाम के लिए किया गया यह उपाय फसल के उत्पादन को सुरक्षित रखता है.

सही पोषण और फंगीसाइड के इस्तेमाल से पौधों की पत्तियां तेजी से स्वस्थ होने लगती हैं. जब पत्तियों को जिंक और नाइट्रोजन मिलता है, तो वे अधिक सूरज की रोशनी अवशोषित करने में सक्षम होती हैं. बेहतर प्रकाश संश्लेषण से पौधे में ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है, जिससे कमजोर दिख रहे पौधे भी कुछ ही दिनों में हरे-भरे और मजबूत नजर आने लगते हैं.

जड़ों का स्वस्थ होना पूरी फसल की बुनियाद है. हवा मिलने और जिंक व यूरिया के असर से जड़ें गहराई तक फैलने लगती है. मजबूत जड़ें मिट्टी से अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों को भी आसानी से खींच पाती हैं. इससे तना मजबूत होता है और पौधे हवा या अन्य विपरीत परिस्थितियों को सहने के काबिल बनते हैं, जिससे फसल का समग्र विकास सुनिश्चित होता है.

पानी निकालने के बाद जल्दबाजी में अत्यधिक उर्वरकों का इस्तेमाल न करें. खाद और दवाओं का छिड़काव हमेशा अनुशंसित मात्रा में ही करें. खेत की नियमित निगरानी करते रहें ताकि किसी भी नए कीट या बीमारी का पता शुरुआत में ही चल सके. सही समय पर की गई यह संतुलित देखभाल और दो जरूरी कदम आपकी धान की फसल को बंपर पैदावार की दिशा में ले जाएंगे.



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