Photo: पुरानी हवेलियों से आधुनिकता तक, गाजियाबाद की पुरानी इमारतें आज भी देती हैं इतिहास की गवाही
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Ghaziabad heritage: गाजियाबाद सिर्फ आधुनिक इमारतों और व्यस्त बाजारों के लिए ही नहीं बल्कि अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के लिए भी मशहूर है. यहां की पहचान पुरानी हवेलियों और मंदिरों से जुड़ी है. शहर के आसपास बनी पुरानी इमारतें आज भी अतीत की झलक दिखाते हैं. गाजियाबाद का नाम ही गाजीउद्दीन नामक मुगल सरदार से जुड़ा है. जिसने यहां कई निर्माण करवाए थे.
गाजियाबाद की पहचान उसके संस्थापक गाजी उद्दीन से जुड़ी है. मुगल काल में वर्ष 1740 के आसपास वज़ीर गाजी उद्दीन ने इस शहर को बसाया था और यहां एक शानदार कोठी का निर्माण कराया. यह कोठी उस समय की बेहतरीन मुगल शैली की इमारतों में गिनी जाती थी. कहते हैं कि इसी कोठी के कारण इलाके का नाम गाज़ीउद्दीननगर पड़ा जो आगे चलकर गाजियाबाद कहलाने लगा. यह कोठी प्रशासन और आवास दोनों के रूप में इस्तेमाल होती थी. समय बीतने के साथ इमारत जर्जर हो गई. लेकिन इसका ऐतिहासिक महत्व आज भी गाजियाबाद की विरासत को याद दिलाता है.

गाजियाबाद का टाउन हॉल वर्ष 1888 में अंग्रेज जिला कलेक्टर एफ. एन. राइट द्वारा बनवाया गया था। उस समय यह इमारत प्रशासन के कामकाज का केंद्र हुआ करती थी. जहां से आसपास के इलाकों में ब्रिटिश शासन चलता था. 1952 में जब पहली नगर पालिका बनी और रामानुज दयाल पहला चेयरमैन बने तब यह टाउन हॉल राजनीतिक सभाओं का स्थल बन गया. 1970 के दशक में यहां टेलीविजन भी लगाया गया था. जिसे देखने के लिए शाम को लोग इकट्ठा होते थे. आज यह खंडहर अवस्था में है और नगर निगम का जोनल ऑफिस है. यह भवन जीर्णोद्धार की प्रतीक्षा कर रहा है जो पुराने समय की याद दिलाता है.

गाजियाबाद के मसूरी में 1864 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने एक भव्य महल जैसा निर्माण कराया. जिसे लोग पीली कोठी कहते है. यह कोठी काफी बड़ी थी. जिसमें 36 कमरे बने थे और खास डिज़ाइन की वजह से सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडी रहती थी. कोठी का नक्शा इंग्लैंड से तैयार कराया गया था. समय के साथ इसकी देखभाल कम हो गई और अब यह खंडहर जैसी हो चुकी है. फिर भी यह अपने ऐतिहासिक और वास्तुशिल्प महत्व के कारण नजर को आकर्षित करती है.

गाजियाबाद का जवाहर गेट शहर की ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है. इसे 1740 में मुगल वज़ीर ग़ाज़ी-उद-दीन ने बनवाया था. उस समय इसे शाही गेट कहा जाता था और यह गाज़ीउद्दीननगर की चार प्रमुख प्रवेश द्वारों में से एक था. आजादी के बाद इस गेट का नाम बदलकर जवाहर गेट रखा गया. पंडित जवाहरलाल नेहरू की याद में। इसकी बनावट पुरानी दिल्ली गेट की तरह खास है और यह आज भी इलाके की पहचान माना जाता है. यहां से गुजरते समय लोग न सिर्फ पुराने इतिहास को महसूस करते हैं बल्कि इसे शहर की संस्कृति और गौरव का प्रतीक भी मानते हैं.

गाजियाबाद के राइट गंज स्कूल की शुरुआत 1821 में एक ब्रिटिश तहसील कार्यालय के रूप में हुई थी. 1881 में इसे एक सरकारी स्कूल में परिवर्तित कर टाउन स्कूल या टेहसील स्कूल का नाम दिया गया. इस प्राचीन इमारत में आज भी 1918 से 1948 तक के हाथ से लिखे पंजी रजिस्टर सुरक्षित रूप से संरक्षित हैं. 1947 में भारत आज़ाद होने के साथ इस स्कूल में मुरलीधर पहले प्रधानाध्यापक बने स्कूल का मुख्य भवन अब खंडहर जैसा हो गया है और इसकी ऐतिहासिक पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किए जाने की प्रतीक्षा कर रही है ।