Sultanpur News: गुड़ वाली जलेबी, चबैना और रोमांचक झूले… गोसाईगंज का ये मेला है बड़ा खास
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ग्रामीण जीवन में यह मेला लोगों की सांस्कृतिक एकता की मिसाल कायम करता है. इसके साथ ही इस मेले में खाने-पीने की कई दुकानें आती हैं.
भारत की आत्मा गांव में बसती है और गांव में लगने वाले मेले को गांव की आत्मा कहा जाता है. मेला किसी भी क्षेत्र की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर होती है, जहां जाति धर्म और भेदभाव को दरकिनार कर लोग एक दूसरे से मिलते हैं और दुकानदार अपनी आय स्रोत भी बनाते हैं. कुछ ऐसा ही एक मेला उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में लगाया जाता है. इसका इतिहास 50 सालों से भी अधिक पुराना है. इस मेले में एक दो हजार नहीं बल्कि 50000 से अधिक भीड़ होती है और यहां आस-पास जिलों के लोग इस मेले का आनंद देने के लिए आते हैं तो आइए जानते हैं क्या है इस मेले की खासियत और कितना पुराना है इसका इतिहास…
इतना पुराना है यह मेला
स्थानीय निवासी अशोक कुमार जायसवाल लोकल 18 से बताते हैं कि गोसाईगंज का मेला 50 वर्षों से भी अधिक पुराना है. उनके बचपन से पहले ही यहां हुसैन का मेला लगता चला आ रहा है. तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में कई तरह की दुकान लगते हैं, जिससे लोग अपने घरेलू उपयोग में आने वाले सामान की खरीदारी करते हैं.
खाने पीने की लगती हैं कई दुकानें
ग्रामीण जीवन में यह मेला लोगों की सांस्कृतिक एकता की मिसाल कायम करता है. इसके साथ ही इस मेले में खाने-पीने की कई दुकानें आती हैं. खाने-पीने की दुकानों में यहां पर गुड वाली जलेबी, चावल का चबैना इसके साथ ही बच्चों के खेलने के लिए कई तरह के गेमिंग टूल्स लगाए जाते हैं. बड़े-बड़े झूले मेले को रोमांचक बनाते हैं.
ग्रामीण जीवन में यह मेला लोगों की सांस्कृतिक एकता की मिसाल कायम करता है. इसके साथ ही इस मेले में खाने-पीने की कई दुकानें आती हैं. खाने-पीने की दुकानों में यहां पर गुड वाली जलेबी, चावल का चबैना इसके साथ ही बच्चों के खेलने के लिए कई तरह के गेमिंग टूल्स लगाए जाते हैं. बड़े-बड़े झूले मेले को रोमांचक बनाते हैं.
दूर-दूर से आते हैं लोग
यहां पर श्री कृष्णा और राधा की झांकियां लगाई जाती हैं और मेले के अंतिम दिन डीजे कंपटीशन भी कराया जाता है. इसको देखने के लिए सुल्तानपुर ही नहीं बल्कि आसपास के जिले के लोग भी आते हैं. गोसाईगंज का मेला श्री कृष्ण जन्माष्टमी के आसपास लगता है.
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