UP 2027: OBC, दलित, सवर्ण और मुस्लिम वोट में कौन बनेगा सबसे बड़ा गेमचेंजर?

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UP 2027: OBC, दलित, सवर्ण और मुस्लिम वोट में कौन बनेगा सबसे बड़ा गेमचेंजर?


उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों आप सब PDA, सामाजिक न्याय, पिछड़ा, दलित और प्रतिनिधित्व जैसे शब्द खूब सुर रहे होंगे. एक तरफ बीजेपी सामाजिक संतुलन और संगठन पर जोर दे रही है. दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी PDA के जरिए नए वोट बैंक की तलाश में है. मायावती की बसपा अपने कोर वोट को बचाने की कोशिश में है. तो कांग्रेस भी सामाजिक न्याय का मुद्दा उठा रही है. लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल वही है, जो हर चुनाव से पहले पूछा जाता है… क्या यूपी की राजनीति बदल रही है या सिर्फ उसकी भाषा या चेहरा बदल रहा है?

‘UP 2027: का कहत बा यूपी?’ सीरीज के पांचवें भाग में समझिए उत्तर प्रदेश के OBC, दलित, सवर्ण और मुस्लिम वोट का पूरा राजनीतिक गणित.

आज की राजनीति को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना जरूरी है.

1990 के बाद कैसे बदली यूपी की राजनीति?: 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों ने पिछड़ी जातियों की राजनीति को नई ताकत दी. इसी दौर में समाजवादी पार्टी ने यादव और मुस्लिम वोट के सहारे अपनी मजबूत पहचान बनाई. दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी ने दलित राजनीति को मुख्यधारा में लाकर नया इतिहास रचा. 1990 के दशक में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत सवर्ण वोट माने जाते थे. बीजेपी ने राम मंदिर आंदोलन के साथ सवर्ण और शहरी वोट बैंक को मजबूत किया. धीरे-धीरे बीजेपी ने गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित समाज में भी अपनी पकड़ बनानी शुरू की. यहीं से यूपी की राजनीति का नया दौर शुरू हुआ. लेकिन 2014 के बाद पार्टी ने अपनी सामाजिक रणनीति बदली. गैर-यादव OBC, गैर-जाटव दलित और लाभार्थी वर्ग तक पहुंच बनाने की कोशिश शुरू हुई. यही बदलाव 2017 विधानसभा चुनाव में साफ दिखाई दिया.

यूपी में सबसे बड़ी लड़ाई OBC वोट की क्यों है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में OBC सबसे बड़ा सामाजिक समूह माना जाता है. विभिन्न सार्वजनिक रिसचों के मुताबिक राज्य की आबादी में इनकी हिस्सेदारी लगभग 40 से 50 प्रतिशत के बीच मानी जाती है. लेकिन OBC एक समान वर्ग नहीं है. इसमें यादव, कुर्मी, मौर्य, शाक्य, सैनी, लोध, निषाद, राजभर, कश्यप और कई अन्य जातियां इस वर्ग का हिस्सा हैं. हर समुदाय की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं और स्थानीय नेतृत्व है. इसी वजह से लगभग हर राजनीतिक दल की रणनीति गैर-यादव OBC वोट पर केंद्रित रहती है.

2017 में बीजेपी ने कैसे बदला चुनावी गणित?

2017 विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. जब भारतीय जनता पार्टी ने 312 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया. सहयोगी दलों को जोड़कर एनडीए का आंकड़ा 325 सीटों तक पहुंच गया. बीजेपी का वोट शेयर करीब 39.67 प्रतिशत रहा. समाजवादी पार्टी को 47 सीटें और लगभग 21.82 प्रतिशत वोट मिले. बसपा का वोट शेयर करीब 22.23 प्रतिशत था, लेकिन उसे सिर्फ 19 सीटें मिलीं. इन नतीजों ने साफ कर दिया कि सिर्फ वोट प्रतिशत नहीं, बल्कि वोट का वितरण और सामाजिक गठजोड़ चुनाव जिताते हैं.

2022 में सपा की वापसी कैसे हुई?

2022 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने अपनी सीटें बढ़ाकर 111 कर लीं. पार्टी का वोट शेयर बढ़कर करीब 32.06 प्रतिशत पहुंच गया. बीजेपी की सीटें घटकर 255 रह गईं, लेकिन पार्टी लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल रही. भाजपा का वोट शेयर बढ़कर करीब 41.29 प्रतिशत हो गया. यहीं से साफ हुआ कि उत्तर प्रदेश की राजनीति अब सीधे बीजेपी बनाम समाजवादी पार्टी की ओर बढ़ रही है. बसपा और कांग्रेस का चुनावी प्रभाव पहले की तुलना में काफी कम हुआ.

2024 लोकसभा चुनाव ने क्या नया संकेत दिया?

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की तस्वीर फिर बदली. समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. भाजपा 33 सीटें जीत सकी. कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं. बसपा का खाता नहीं खुला. इन नतीजों ने यह संकेत जरूर दिया कि विपक्ष पहले की तुलना में मजबूत हुआ है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव का सामाजिक व्यवहार पूरी तरह एक जैसा नहीं होता. इसलिए 2024 के नतीजों को सीधे 2027 का परिणाम मान लेना जल्दबाजी होगी.

क्या OBC वोट फिर बनेगा सबसे बड़ा गेमचेंजर?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज सबसे ज्यादा चर्चा गैर-यादव OBC वोट की है. बीजेपी पिछले एक दशक से इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. पार्टी ने संगठन और सरकार दोनों में अलग-अलग पिछड़ी जातियों को प्रतिनिधित्व देने की रणनीति अपनाई. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी PDA के जरिए इसी वर्ग में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहती है. यानी 2027 में सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ OBC वोट की नहीं होगी, बल्कि गैर-यादव OBC वोट की होगी.

क्या दलित वोट अब भी BSP की सबसे बड़ी ताकत है?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर किसी सामाजिक वर्ग ने सबसे ज्यादा राजनीतिक बदलाव देखा है तो वह दलित वोट है. एक समय था जब दलित राजनीति का मतलब बसपा और मायावती माना जाता था. 2007 में बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. इसे सामाजिक इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा प्रयोग माना गया. लेकिन इसके बाद तस्वीर धीरे-धीरे बदलने लगी. 2012 में बसपा सत्ता से बाहर हो गई. 2017 में पार्टी का वोट शेयर करीब 22.23% रहा, लेकिन उसे सिर्फ 19 सीटें मिलीं. यानी वोट तो मिले, लेकिन वे सीटों में नहीं बदल सके. 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर घटकर करीब 12.88% रह गया और पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी. यही वजह है कि आज दलित वोट उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाइयों में शामिल है. राजनीतिक अध्ययनों के मुताबिक जाटव मतदाताओं का बड़ा हिस्सा अब भी बसपा के साथ माना जाता है, जबकि गैर-जाटव दलितों में पिछले कुछ चुनावों के दौरान भाजपा की पकड़ बढ़ी है. हालांकि यह निष्कर्ष पोस्ट-पोल सर्वे के रुझानों पर आधारित हैं. आपको बता दें कि चुनाव आयोग जातिवार मतदान का आधिकारिक डेटा जारी नहीं करता.

क्या सवर्ण वोट अब भी बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत है?

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य और कायस्थ जैसे सवर्ण वर्ग लंबे समय से भाजपा का मजबूत आधार माने जाते हैं. 2014 के बाद यह समर्थन और मजबूत हुआ. हालांकि बीच-बीच में ब्राह्मण नाराजगी और स्थानीय असंतोष की चर्चा जरूर होती रही, लेकिन चुनावी नतीजे बताते हैं कि राज्य स्तर पर भाजपा का सवर्ण आधार अब भी काफी मजबूत बना हुआ है. इसी आधार के साथ भाजपा ने गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित समाज में भी अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश की. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही सामाजिक विस्तार पिछले एक दशक में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत रहा है.

मुस्लिम वोट… क्या अब पहले से ज्यादा एकजुट है?

उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 19 प्रतिशत मानी जाती है. राज्य की कई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर यह वोट निर्णायक भूमिका निभाता है. लेकिन 2017 विधानसभा चुनाव में विपक्ष के बिखराव का असर मुस्लिम वोट पर भी पड़ा. लेकिन 2022 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में कई सीटों पर विपक्ष के पक्ष में मुस्लिम मतदाताओं के अपेक्षाकृत अधिक एकजुट होने का रुझान विभिन्न पोस्ट-पोल अध्ययनों में सामने आया. हालांकि हर सीट की अपनी अलग राजनीतिक परिस्थिति होती है. उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण और गठबंधन भी मतदान को प्रभावित करते हैं. इसलिए पूरे प्रदेश के लिए एक जैसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा.

2027 में सबसे बड़ी लड़ाई कहां होगी?

अगर मौजूदा राजनीतिक संकेतों को देखें तो 2027 की लड़ाई चार बड़े सामाजिक वर्गों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है.

पहला, गैर-यादव OBC.

दूसरा, गैर-जाटव दलित.

तीसरा, महिलाओं और सरकारी योजनाओं के लाभार्थी.

चौथा, युवा मतदाता, जिनके लिए रोजगार, भर्ती और शिक्षा बड़े मुद्दे हैं.

इसी वजह से भाजपा हो या समाजवादी पार्टी, सभी दल अपनी रणनीति इन वर्गों को ध्यान में रखकर बना रहे हैं.

क्या जाति की राजनीति खत्म हो रही है?
इस सवाल का जवाब फिलहाल नहीं है. हां, इतना जरूर बदला है कि अब सिर्फ जाति के भरोसे चुनाव जीतना आसान नहीं रहा. आज जाति के साथ नेतृत्व, संगठन, लाभार्थी योजनाएं, स्थानीय उम्मीदवार, कानून-व्यवस्था, महंगाई, रोजगार और गठबंधन भी चुनावी नतीजों को प्रभावित कर रहे हैं. यानी जाति अभी भी उत्तर प्रदेश की राजनीति का बड़ा आधार है, लेकिन अब वह अकेला आधार नहीं रह गई है. कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति को अब सिर्फ एक जाति या एक समीकरण से नहीं समझा जा सकता. भाजपा ने पिछले एक दशक में अपने सामाजिक आधार का विस्तार किया है. समाजवादी पार्टी PDA के जरिए नया सामाजिक गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रही है. बसपा अपने परंपरागत वोट बैंक को बचाने की चुनौती से जूझ रही है, जबकि कांग्रेस नए राजनीतिक अवसर तलाश रही है. ऐसे में 2027 का चुनाव सिर्फ यह नहीं तय करेगा कि किस पार्टी को कितनी सीटें मिलेंगी, बल्कि यह भी बताएगा कि उत्तर प्रदेश की नई राजनीति का केंद्र आखिर कौन-सा सामाजिक वर्ग बनेगा.

अगले भाग में पढ़िए…

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