आपके खेत में भी नहीं टिक रहा पानी? धान किसान बस कर लें ये 3 छोटे काम
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Paddy Farming Tips : तेज धूप और बढ़ते तापमान की वजह से खेतों में पानी नहीं रुक रहा है. इससे पौधे झुलसने की कगार पर हैं. शाहजहांपुर के किसान रनजोद सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि इस तपती गर्मी में धान के खेत में पानी रोकना सबसे बड़ी चुनौती है. वे बताते हैं कि किसानों को सबसे पहले खेत की पडलिंग को अधिक गहरा करना चाहिए. मिट्टी को अच्छी तरह मथने से नीचे एक ठोस परत बन जाती है, जो पानी का रिसाव रोकती है. खेत की बाहरी घेराबंदी यानी मेड़ों पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है.
शाहजहांपुर. उत्तर भारत समेत देश के कई हिस्सों में पड़ रही भीषण गर्मी ने धान उत्पादक किसानों की चिंता बढ़ा दी है. तेज धूप और बढ़ते तापमान के कारण धान के खेतों में पानी नहीं रुक रहा है, जिससे पौधे झुलसने की कगार पर हैं. पानी की भारी कमी के कारण फसल को बचाने के लिए किसान परेशान हैं. ऐसे संकट के समय कृषि एक्सपर्ट ने कुछ बेहद कारगर और देसी उपाय सुझाते हैं. इन उपायों को अपनाकर किसान अपने खेतों की जलधारण क्षमता को आसानी से बढ़ा सकते हैं, जिससे पानी लंबे समय तक टिकेगा और फसल सुरक्षित रहेगी. शाहजहांपुर के प्रगतिशील युवा किसान रनजोद सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि इस तपती गर्मी में धान के खेत में पानी रोकना सबसे बड़ी चुनौती है, जिसे सही प्रबंधन से हल किया जा सकता है.
किसानों को सबसे पहले खेत की पडलिंग को अधिक गहरा करना चाहिए. मिट्टी को अच्छी तरह मथने से नीचे एक ठोस परत बन जाती है, जो पानी का रिसाव रोकती है. अगर मिट्टी रेतीली है, तो प्रति एकड़ 2 से 3 ट्रॉली गोबर की खाद या हरी खाद का प्रयोग जरूरी रूप से करें. मेड़ों को ऊंचा और मजबूत करके पानी की बर्बादी को पूरी तरह रोका जा सकता है.
इसे गहरा और मजबूत बनाएं
किसान रनजोद सिंह के मुताबिक, धान की फसल के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण कदम खेत की सही पडलिंग करना है. इस कड़कड़ाती धूप और भीषण गर्मी में किसानों को अपने खेत की पडलिंग को सामान्य से अधिक गहरा और मजबूत करना चाहिए. जब खेत को पानी भरकर अच्छी तरह से जोता और मथा जाता है, तो मिट्टी के कण आपस में कस जाते हैं. इससे जमीन के भीतर एक ठोस परत बन जाती है, जो पानी को नीचे रिसने से प्रभावी रूप से रोकती है.
रेतीली मिट्टी में क्या करें
जिन क्षेत्रों में मिट्टी रेतीली या हल्की है, वहां पानी बहुत तेजी से जमीन के अंदर सोख लिया जाता है. ऐसी स्थिति से निपटने के लिए विशेषज्ञों ने जैविक खाद के इस्तेमाल की सलाह दी है. किसानों को अपने खेतों में प्रति एकड़ कम से कम 2 से 3 ट्रॉली अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद या हरी खाद मिलानी चाहिए. यह देसी तरीका मिट्टी की बनावट को सुधारता है और उसकी जलधारण क्षमता को कई गुना बढ़ा देता है.
अनावश्यक रिसाव के लिए क्या
खेत की मिट्टी को सुधारने के साथ-साथ उसकी बाहरी घेराबंदी यानी मेड़ों पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है. अक्सर कमजोर या चूहे आदि द्वारा खोखली की गई मेड़ों के कारण खेत का पानी बाहर बह जाता है. इसलिए, किसानों को अपने खेतों की मेड़ों को सामान्य से अधिक ऊंचा, चौड़ा और मिट्टी कूटकर मजबूत बनाना चाहिए. मजबूत मेड़बंदी पानी के अनावश्यक रिसाव को पूरी तरह रोकती है और पानी को लंबे समय तक रोक रखती है.
लागत में कमी, दोहरा लाभ
इन पारंपरिक और वैज्ञानिक देसी उपायों को अपनाने से किसानों को दोहरा लाभ मिलता है. एक ओर जहां भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप के बावजूद खेत में नमी बरकरार रहती है, जिससे धान के पौधे सुरक्षित और हरे-भरे रहते हैं, दूसरी ओर बार-बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं पड़ती है. इससे डीजल और बिजली पर होने वाला अतिरिक्त खर्च बचता है. कम लागत में बेहतर फसल उत्पादन के लिए यह जल प्रबंधन आज के समय में बेहद जरूरी है.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें