कैसे बने कीनाराम इतने बड़े अघोराचार्य, कब हुआ वैराग्य और कहां पर हुई थी दीक्षा? जानें रोचक कहानी
Last Updated:
Ballia News: कीनाराम चलते-चलते बलिया जनपद के सदर तहसील अंतर्गत कारों गांव में पहुंच गए. इसे कामेश्वर धाम कारो या काम दहन भूमि भी कहा जाता है. यहीं पर भगवान शंकर ने तपस्या किया था. यहां प्राचीन काल में राम, लक्ष…और पढ़ें
प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय ने कहा कि अघोर पंथ के प्रतिस्थापक स्वामी कीनाराम महाराज का जन्म चंदौली जिले के रामगढ़ में हुआ था. इनके पिता का नाम अकबर सिंह और मां का नाम मनसा देवी था. इनके जन्मतिथि के बारे में कुछ भ्रम है, लेकिन 1693 में इनका जन्म बताया जाता हैं. इनके माता-पिता की कोई संतान जीवित नहीं रहती थी, तो लोगों ने कहा कि इस बच्चे की खरीद बिक्री कर दीजिए. ऐसी पहले की परंपरा भी थी, तो उनका नाम कीनाराम हो गया.
कीनाराम चलते-चलते बलिया जनपद के सदर तहसील अंतर्गत कारों गांव में पहुंच गए. इसे कामेश्वर धाम कारो या काम दहन भूमि भी कहा जाता है. यहीं पर भगवान शंकर ने तपस्या किया था. यहां प्राचीन काल में राम, लक्ष्मण और विश्वामित्र भी आए थे. जब कीनाराम यहां आए उस समय इस मठ पर तत्कालीन महंथ शिवाराम महाराज थे. कीनाराम की पहली दीक्षा गुरु शिवराम ने दिया. आज भी कारों में शिवाराम की समाधि स्थल है, जहां अघोर पंथ के सभी बड़े-बड़े संत महात्मा आते है. यहां से कीनाराम सीधे हिंगलाज भवानी गए, इसके बाद वह वाराणसी तपस्या के लिए आ गए, जो आज कीनाराम आश्रम स्थल या क्रीं कुंड के नाम से देश दुनिया में मशहूर हुआ है.
बलिया के कारो में कीनाराम के साथ एक घटना भी घटित हुई थी, जिसमें इनको एक वृद्ध महिला की रोने की आवाज सुनाई दी थी. बाबा ने पता किया तो इस महिला के पुत्र को कुछ लोगों ने पकड़ कर अपने ले गए थे. इन्होंने उसको छुड़ाया जिसको देख महिला प्रसन्न हुई और उसने कहा कि बाबा मेरे बेटे को अपना शिष्य बना लीजिए. आगे चलकर यही बेटा बाबा का शिष्य बिजाराम के नाम से प्रख्यात हुआ. फिलहाल शिवाराम की समाधि की सेवा बुजुर्ग नथुनी कर रहे हैं. कहा कि यही पर शिवाराम महाराज ने जिंदा समाधि ली थी जो कीनाराम के गुरु थे.