ग्लोबल वार्मिंग-क्लाइमेट चेंज मानवता के लिए बड़ा खतरा, AMU प्रोफेसर सालेहा जमाल ने दी चेतावनी, बताई वजह
अलीगढ़: दुनिया भर में बढ़ते तापमान और बदलते मौसम पैटर्न ने मानव जीवन, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालना शुरू कर दिया है. ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज आज ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे बन चुके हैं, जो सिर्फ वैज्ञानिक बहस तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हर देश, हर समाज और हर व्यक्ति के भविष्य से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं. इसलिए यह समझना बेहद जरूरी है कि इन दोनों में अंतर क्या है, यह क्यों हो रहा है और इसके क्या प्रभाव सामने आ सकते हैं. इसी विषय पर एएमयू की वैज्ञानिक सालेहा जमाल ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा की.
ग्लोबल वार्मिंग क्या है?
जानकारी देते हुए एएमयू के डिपार्टमेंट ऑफ जियोग्राफी की एसोसिएट प्रोफेसर सालेहा जमाल ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए पर्यावरणीय मुद्दे हैं. ग्लोबल वार्मिंग को हम क्लाइमेट चेंज का कारण भी कह सकते हैं और उसका प्रभाव भी. ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है लंबे समय तक पृथ्वी के औसत तापमान में लगातार बढ़ोतरी. वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.5°C तक बढ़ चुका है, जिसका स्पष्ट असर दुनिया के मौसम पैटर्न पर देखा जा रहा है.
क्लाइमेट चेंज क्या है?
प्रोफेसर जमाल ने बताया कि इसके विपरीत क्लाइमेट चेंज एक व्यापक अवधारणा है. इसमें तापमान में बदलाव के साथ-साथ बारिश के पैटर्न में गड़बड़ी, कहीं अत्यधिक बारिश, कहीं बिल्कुल बारिश न होना. इतना ही नहीं, असामान्य गर्मी या ठंड और हवाओं के पैटर्न में बदलाव…ऐसी असामान्य मौसम घटनाओं को क्लाइमेट एनॉमलीज कहा जाता है.
उन्होंने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख कारण है ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा, जिनमें कार्बन डाइऑक्साइड, वाटर वेपर, मीथेन और क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) मुख्य रूप से शामिल हैं. ये गैसें औद्योगिकीकरण, बढ़ते शहरीकरण और वनों की कटाई के कारण तेजी से बढ़ी हैं. आज वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर प्री-इंडस्ट्रियल पीरियड की तुलना में कई गुना बढ़ चुका है.
क्लाइमेट चेंज के कारण
क्लाइमेट चेंज के कारण प्राकृतिक भी हो सकते हैं और मानव-जनित भी. मानव-जनित कारणों में तेजी से बढ़ता शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, बढ़ती जनसंख्या, कृषि विस्तार और वनों की कटाई शामिल हैं. उन्होंने आगे कहा, ‘ग्लोबल वार्मिंग का सीधा प्रभाव तापमान में वृद्धि और हीटवेव्स के रूप में सामने आता है. कई क्षेत्रों में सूखा पड़ने लगता है और मौसम का संतुलन बिगड़ जाता है.’
क्लाइमेट चेंज से
क्लाइमेट चेंज के प्रमुख प्रभावों में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, समुद्र-स्तर का बढ़ना, तटीय इलाकों का डूबना, बार-बार बाढ़ आना, कहीं सूखा पड़ना, कृषि पर गंभीर असर पड़ना आदि शामिल हैं. उन्होंने कहा कि कृषि पूरी तरह क्लाइमेट पर निर्भर है. बारिश का समय, तापमान और मौसम में गड़बड़ी सीधे फसल उत्पादन को प्रभावित करती है.
अंतरराष्ट्रीय प्रयास
प्रोफेसर सालेहा कहती हैं कि यह दोनों समस्याएं मानवता के लिए बेहद बड़ा खतरा बन चुकी हैं और इन पर तुरंत कदम उठाना आवश्यक है. दुनिया के देश मिलकर इन समस्याओं पर कदम उठा रहे हैं. सीओपी यानी कि कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज, पेरिस ऐग्रीमेंट और ग्लासगो सीओपी जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस बात पर चर्चा होती है कि ग्लोबल तापमान को कैसे नियंत्रित किया जाए. लक्ष्य यह है कि तापमान बढ़ोतरी को 1.5°C तक सीमित रखा जाए, क्योंकि वैज्ञानिक चेतावनी दे चुके हैं कि तापमान अगर इस सदी के अंत तक 2.5°C तक बढ़ गया तो यह मानवता के लिए गंभीर खतरा होगा.
भारत निभा रहा महत्वपूर्ण भूमिका
कहा कि भारत भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और नेट-ज़ीरो का लक्ष्य निर्धारित कर चुका है. यानी जितना कार्बन वातावरण में छोड़ा जाएगा, उतना ही अवशोषित भी किया जाएगा. सरकार सोलर और विंड जैसी नवीकरणीय ऊर्जा को तेजी से बढ़ा रही है ताकि कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सके. सालेहा कहती है कि सरकार के अलावा हर व्यक्ति भी योगदान दे सकता है. जैसे कि अनावश्यक बिजली का उपयोग न करें, पानी की बचत करें, एसी का इस्तेमाल केवल जरूरत के समय करें, पेड़-पौधे लगाएं और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाएँ. छोटे-छोटे कदम मिलकर बड़े बदलाव पैदा कर सकते हैं.