चंद्रशेखर आजाद का बड़ा दांव, 45 सीटों पर प्रभारियों की पहली सूची जारी की

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चंद्रशेखर आजाद का बड़ा दांव, 45 सीटों पर प्रभारियों की पहली सूची जारी की


लखनऊ : उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने संगठन विस्तार और चुनावी तैयारी का पहला बड़ा संकेत दे दिया है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के निर्देश पर 45 विधानसभा क्षेत्रों के लिए प्रभारियों की पहली सूची जारी की गई है. यह लिस्‍ट केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं है, बल्कि इससे पार्टी की चुनावी रणनीति, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं भी साफ दिखाई देती हैं. सूची में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड और मध्य यूपी तक की सीटों को शामिल किया गया है. खास बात यह है कि पार्टी ने केवल सामान्य सीटों पर ही नहीं बल्कि बड़ी संख्या में अनुसूचित जाति (आरक्षित) सीटों पर भी संगठन को मजबूत करने की शुरुआत की है.

पश्चिमी यूपी पर सबसे ज्यादा जोर
45 सीटों में सबसे अधिक फोकस पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर दिखाई देता है. मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, हापुड़, अलीगढ़, हाथरस, आगरा, फिरोजाबाद, बरेली, शाहजहांपुर और बदायूं जैसे जिलों की कई सीटों पर प्रभारी नियुक्त किए गए हैं. यह वही इलाका है जहां भाजपा, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और बसपा के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता रहा है. साथ ही यहां दलित, मुस्लिम, जाट, गुर्जर, सैनी, कश्यप, वाल्मीकि और ओबीसी वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि चंद्रशेखर आजाद की राजनीतिक पहचान भी पश्चिमी यूपी से बनी है. इसलिए पार्टी पहले अपने सबसे मजबूत क्षेत्र में संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है.

दलित वोट बैंक को वापस जोड़ने की कोशिश
सूची का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अनुसूचित जाति वर्ग पर विशेष फोकस है. 45 में से बड़ी संख्या में एससी वर्ग के प्रत्‍याशी रखे गए हैं. साथ ही हापुड़ (सुरक्षित), हाथरस (सुरक्षित), आगरा कैंट, टूंडला, श्रीनगर, हरगांव, मिश्रिख, गोपामऊ, बांसगांव, सलेमपुर, मड़ियाहूं और जखनियां जैसी आरक्षित सीटों पर विशेष नियुक्तियां की गई हैं. यह इशारा करता है कि पार्टी बसपा के पारंपरिक जाटव और अन्य दलित वोट बैंक में अपनी मजबूत पैठ बनाना चाहती है. पिछले कुछ सालों में चंद्रशेखर आजाद लगातार दलित आंदोलनों के जरिए अपनी पहचान बना चुके हैं और अब उसे चुनावी संगठन में बदलने की कोशिश कर रहे हैं.

मुस्लिम प्रतिनिधित्व भी उल्लेखनीय
सूची में मुस्लिम समाज से आने वाले कई नेताओं को भी जिम्मेदारी दी गई है. थाना भवन, किशोर, मेरठ शहर, फिरोजाबाद, सहसवान, रोहिनगर, इटवा और तमकुहीराज जैसी सीटों पर मुस्लिम प्रभारी बनाए गए हैं. इससे साफ इशारा मिलता है कि पार्टी दलित-मुस्लिम सामाजिक गठजोड़ को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. यही सामाजिक समीकरण कई चुनावों में समाजवादी पार्टी और बसपा की ताकत रहा है.

OBC पर भी बराबर नजर
लिस्‍ट में ओबीसी वर्ग के नेताओं को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है. कई सीटों पर यादव, चौधरी, गुर्जर, लोधी और अन्य पिछड़े वर्ग से जुड़े नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है. इससे साफ है कि पार्टी केवल दलित और मुस्लिम राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि गैर-यादव और यादव दोनों वर्गों के ओबीसी वोटरों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है.

लिस्‍ट का सामाजिक विश्लेषण किया जाए तो इसमें मोटे तौर पर तीन बड़े वर्गों को तवज्‍जो दी गई है. अनुसूचित जाति को सबसे अधिक प्रतिनिधित्व, दूसरा सबसे बड़ा हिस्‍सा अन्य पिछड़ा वर्ग यानि ओबीसी और तीसरा मुस्लिम समुदाय है. सिख समाज से भी एक प्रतिनिधि को जिम्मेदारी दी गई है.

अगर आजाद समाज पार्टी अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने में सफल रहती है तो इसका सबसे अधिक असर तीन दलों पर पड़ सकता है. पहला बसपा, क्‍योंकि दलित वोटों में सबसे ज्यादा चुनौती उसे ही मिल सकती है. खासकर जाटव और युवा दलित मतदाताओं के बीच चंद्रशेखर आजाद की पकड़ बढ़ने की चर्चा लंबे समय से होती रही है. दूसरा समाजवादी पार्टी, क्‍योंकि मुस्लिम और दलित वोटों के संभावित बंटवारे की स्थिति में सपा को भी कुछ सीटों पर नुकसान हो सकता है, खासकर पश्चिमी यूपी और रोहिलखंड में. तीसरा भाजपा.. क्‍योंकि अगर आजाद समाज पार्टी लोकल लेवल पर मजबूत संगठन तैयार कर लेती है और विपक्षी वोटों का नया ध्रुवीकरण होता है तो कुछ करीबी मुकाबलों वाली सीटों पर भाजपा की चुनावी गणित भी प्रभावित हो सकती है. हालांकि इसका असली असर उम्मीदवारों, स्थानीय समीकरणों और चुनावी गठबंधनों पर निर्भर करेगा.

सीट चयन भी देता है राजनीतिक संकेत
सूची में शामिल सीटों को देखें तो इनमें पश्चिमी यूपी, दलित बहुल, मुस्लिम प्रभाव वाली और कई राजनीतिक रूप से संवेदनशील विधानसभा सीटें शामिल हैं. आगरा, मेरठ, अलीगढ़, बरेली, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, जौनपुर, गाजीपुर, वाराणसी और अयोध्या जैसे क्षेत्रों में संगठन खड़ा करने का प्रयास बताता है कि पार्टी पूरे प्रदेश में अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है, न कि केवल कुछ जिलों तक सीमित रहना. यह लिस्‍ट बताती है कि आजाद समाज पार्टी अभी उम्मीदवार घोषित करने के बजाय संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने की रणनीति पर चल रही है. आने वाले महीनों में अगर पार्टी इसी तरह बाकी विधानसभा क्षेत्रों पर भी प्रभारी नियुक्त करती है तो 2027 के चुनाव में वह केवल प्रतीकात्मक नहीं बल्कि कई सीटों पर प्रभाव डालने वाली ताकत बनने की कोशिश करती दिखाई दे सकती है.



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