जिसकी कलम से निकला ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’, जानिए कौन थे तिरंगे को आवाज देने वाले श्यामलाल
कानपुर: तिरंगा देखते ही आज भी जिन पंक्तियों से देशभक्ति का जज्बा जाग उठता है, उनमें ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा’ सबसे खास हैं. इन पंक्तियों को लिखने वाले श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का कानपुर से गहरा नाता था. नर्वल कस्बे में जन्मे पार्षद केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि देशभक्त, स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और रामकथा के जानकार भी थे. खास बात यह है कि उन्होंने महज 15 साल की उम्र में रामकथा के बालकांड की रचना कर दी थी.
इतिहासकार अनूप शुक्ला के अनुसार, श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का जन्म 9 सितंबर 1896 को कानपुर के नर्वल कस्बे में एक सामान्य वैश्य परिवार में हुआ था. उनके पिता विश्वेश्वर प्रसाद गुप्त और मां कौशिल्या देवी थीं. बचपन से ही उनका मन कविता और रामकथा में लगता था. पांचवीं कक्षा से ही उनकी काव्य प्रतिभा दिखाई देने लगी थी.
15 साल की उम्र में लिख दिया था बालकांड
महज 15 साल की उम्र में उन्होंने हरिगीतिका छंद में रामकथा का बालकांड लिख दिया था. उनके पिता को डर था कि कविता लिखने से बेटा गरीबी में जीवन बिताएगा. इसी वजह से उन्होंने बालकांड की पांडुलिपि कुएं में फिंकवा दी. हालांकि, इससे पार्षद का साहित्य और भक्ति से रिश्ता खत्म नहीं हुआ. उन्होंने अयोध्या के मौनी बाबा से दीक्षा ली और साधना के साथ रामकथा लिखना जारी रखा.
गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रेरणा से लिखा झंडा गीत
बाद में श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ की मुलाकात ‘प्रताप’ के संपादक और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी से हुई. विद्यार्थी की प्रेरणा ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. इसके बाद 3 और 4 मार्च 1924 को उन्होंने वह प्रसिद्ध ध्वज गीत लिखा, जिसकी पंक्तियां आज भी लोगों की जुबान पर हैं.
कानपुर के फूलबाग में पहली बार गूंजा था गीत
‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ गीत का पहला सार्वजनिक गायन 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग में जलियांवाला बाग स्मृति दिवस के कार्यक्रम में हुआ था. इस कार्यक्रम में पंडित जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे. इसके बाद यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तेजी से लोकप्रिय हो गया. कांग्रेस के अलग-अलग अधिवेशनों में लोग इसे मिलकर गाते थे. गीत में तिरंगे के तीन रंगों को अलग-अलग भावों से जोड़ा गया था. इसकी पंक्तियां लोगों में देशभक्ति और आजादी की भावना जगाती थीं. अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई के दौरान यह गीत युवाओं में जोश भरने का काम करता था.
आजादी की लड़ाई में खुद भी जेल गए
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ सिर्फ गीत लिखकर ही नहीं रुके, बल्कि आजादी की लड़ाई में खुद भी शामिल हुए. असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने पर 21 अगस्त 1921 को उन्हें गिरफ्तार कर पहली बार जेल भेजा गया. इसके बाद उन्होंने नमक आंदोलन में भी हिस्सा लिया. अपने जीवन में वह आठ बार जेल गए और करीब साढ़े छह साल अंग्रेजों की जेल में बिताए. फतेहपुर के अंग्रेज कलेक्टर ने उन्हें ‘दुर्दांत क्रांतिकारी’ तक घोषित कर दिया था.
लाल किले की प्राचीर से खुद गाया अपना गीत
देश आजाद होने के बाद भी श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ को सम्मान मिलता रहा. 15 अगस्त 1952 को उन्होंने लाल किले की प्राचीर से खुद अपना लिखा झंडा गीत गाया. इसके बाद 15 अगस्त 1972 को लाल किले में उनका अभिनंदन किया गया और उन्हें ताम्रपत्र दिया गया. 26 जनवरी 1973 को उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया. रामकथा से उनका रिश्ता भी जीवनभर बना रहा. साल 1954 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में उनसे रामायण का वाचन कराया था.
सादगी भरा था जीवन
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का जीवन बेहद सादा था. वह खादी का कुर्ता-धोती पहनते थे और अक्सर नंगे पैर चलते थे. एक बार पैर में कांच या कांटा लगने के बाद घाव गंभीर हो गया. उर्सला अस्पताल में इलाज के दौरान 10 अगस्त 1977 को उनका निधन हो गया. 11 अगस्त को भैरवघाट में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया.
पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनके बारे में कहा था कि हो सकता है लोग पार्षद को व्यक्तिगत रूप से न जानते हों, लेकिन पूरा देश राष्ट्रीय ध्वज पर लिखे उनके गीत से परिचित है. यही वजह है कि कानपुर के नर्वल की मिट्टी में जन्मे श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ आज भी तिरंगे की हर लहराती पताका के साथ याद किए जाते हैं.