पत्नी की आखिरी ख्वाहिश पूरी करने के लिए इस शख्स ने खोली अनोखी लाइब्रेरी…
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Aligarh News: अलीगढ़ में ‘खायबान-ए-अदब’ लाइब्रेरी प्रो. सगीर इफराहीम ने अपनी दिवंगत पत्नी सीमा सगीर की याद में बनाई है. यह लाइब्रेरी 24 घंटे खुली रहती है और यहां 10,000 से ज्यादा किताबें हैं.
हाइलाइट्स
- अलीगढ़ में मुफ्त लाइब्रेरी, 24 घंटे खुली रहती है.
- प्रोफेसर सगीर ने पत्नी की याद में लाइब्रेरी बनाई.
- लाइब्रेरी में मुफ्त चाय और 10,000 से ज्यादा किताबें.
अलीगढ़: उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में एक ऐसी लाइब्रेरी मौजूद है जो सिर्फ पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि उम्मीदों और इंसानियत से भरी एक मिसाल बन चुकी है. इस लाइब्रेरी का नाम है ‘खायबान-ए-अदब’, जिसे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व उर्दू प्रोफेसर सगीर इफराहीम ने अपनी दिवंगत पत्नी सीमा सगीर की याद में शुरू किया है. यह लाइब्रेरी सिर्फ किताबों का संग्रह नहीं, बल्कि उस अधूरे ख्वाब की तामीर है जिसे सीमा सगीर ने ज़िंदगी के आखिरी पलों में जिया था.
सीमा के सपनों से जन्मी ‘खायबान-ए-अदब’
प्रोफेसर सगीर इफराहीम ने बताया कि उनकी पत्नी प्रो. सीमा सगीर का सपना था कि गरीब और जरूरतमंद बच्चों के लिए एक ऐसी लाइब्रेरी बनाई जाए जहां पढ़ने के लिए न समय की पाबंदी हो, न फीस का बोझ. इसी सोच से उन्होंने यह लाइब्रेरी बनाई जो 24 घंटे खुली रहती है. यहां कोई भी, कभी भी आकर पढ़ सकता है.
10,000 से ज़्यादा किताबें
इस लाइब्रेरी में अभी तक 10,000 से ज़्यादा किताबें हैं और जरूरत के अनुसार किताबें लगातार बढ़ाई जा रही हैं. छात्रों के लिए सब्जेक्ट वाइज किताबें भी उपलब्ध कराई जाती हैं. खास बात यह है कि यहां पढ़ने वालों से कोई फीस नहीं ली जाती, बल्कि प्रोफेसर सगीर खुद उन्हें चाय भी पिलाते हैं ताकि वे बिना थके पढ़ाई कर सकें. उनका मानना है कि छात्र उनका एहसान नहीं, बल्कि वो खुद छात्रों का एहसान मानते हैं कि वे यहां पढ़ने आते हैं.
इस लाइब्रेरी में अभी तक 10,000 से ज़्यादा किताबें हैं और जरूरत के अनुसार किताबें लगातार बढ़ाई जा रही हैं. छात्रों के लिए सब्जेक्ट वाइज किताबें भी उपलब्ध कराई जाती हैं. खास बात यह है कि यहां पढ़ने वालों से कोई फीस नहीं ली जाती, बल्कि प्रोफेसर सगीर खुद उन्हें चाय भी पिलाते हैं ताकि वे बिना थके पढ़ाई कर सकें. उनका मानना है कि छात्र उनका एहसान नहीं, बल्कि वो खुद छात्रों का एहसान मानते हैं कि वे यहां पढ़ने आते हैं.
हर वर्ग और उम्र के लिए खुला है दरवाज़ा
खायबान-ए-अदब न सिर्फ विद्यार्थियों के लिए, बल्कि रिटायर्ड लोगों के लिए भी एक शांत और उपयोगी जगह है. जो लोग अपने खाली समय में कुछ सीखना या पढ़ना चाहते हैं, उनके लिए भी यह लाइब्रेरी एक बेहतरीन विकल्प बन चुकी है.
प्रो. सगीर बताते हैं कि जब उनकी पत्नी बीमार थीं, तब दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने इस लाइब्रेरी और एक मैगज़ीन की बात कही थी. सीमा का सपना था कि एक साहित्यिक पत्रिका भी निकाली जाए, जो अब इस लाइब्रेरी से रोजाना रूप से प्रकाशित होती है.