बरेली का बिहारीपुर: 1657 का मुग़ल इतिहास और मशहूर स्वाल-आलू का अनोखा स्वाद
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Bareilly News: 1657 में मुग़ल फौजदार मुकरंद राय द्वारा बसाया गया बरेली का ऐतिहासिक मोहल्ला ‘बिहारीपुर’ आज अपनी अटूट गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए जाना जाता है. दरगाह आला हज़रत और प्राचीन बिहारी जी मंदिर की विरासत को समेटे इस क्षेत्र की सबसे अनोखी पहचान यहां का पारंपरिक नाश्ता ‘स्वाल-आलू’ है. मैदे की कुरकुरी पापड़ी और मसालेदार उबले आलू का यह संगम पिछले 70 सालों से हिटटी लाला और विजय स्वीट्स जैसी दुकानों पर पर्यटकों और स्थानीय लोगों की पहली पसंद बना हुआ है.
Bareilly News: इतिहास की खुशबू और मुगलकालीन विरासत को समेटे उत्तर प्रदेश का बरेली शहर आज भी अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए जाना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी बरेली के दिल में बसा ‘बिहारीपुर’ एक ऐसी जगह है जहां इतिहास का गौरव और स्वाद का अनोखा संगम एक साथ देखने को मिलता है? मुकरंद राय के दौर से शुरू हुई इस मोहल्ले की कहानी आज अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के साथ-साथ यहां के पारंपरिक और बेहद मशहूर नाश्ते ‘स्वाल-आलू’ के लिए देश-दुनिया में एक अनूठी पहचान बना चुकी है. आइए जानते हैं इतिहास और स्वाद के इस दिलचस्प सफरनामे को.
मुगल फौजदार मुकरंद राय ने रखी थी नींव
वरिष्ठ इतिहासकार डॉक्टर राजेश कुमार शर्मा ने लोकल 18 को बताया कि इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि आधुनिक बरेली शहर की स्थापना वर्ष 1657 में मुगल शासन के फौजदार मुकरंद राय ने की थी. शहर को बसाने के दौरान उन्होंने कई मोहल्लों की नींव रखी, जिनमें बिहारीपुर भी शामिल था. माना जाता है कि इस क्षेत्र का नाम यहाँ स्थित भगवान बिहारी जी के प्राचीन मंदिर के कारण पड़ा. बिहारीपुर के आसपास मलूकपुर, काज़ीटोला, कुतुबखाना, साहूकारा और पुराने बाज़ार जैसे ऐतिहासिक इलाके बसे, जिन्होंने समय के साथ बरेली की सांस्कृतिक पहचान को और समृद्ध बनाया.
गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवंत मिसाल
डॉ. शर्मा बताते हैं कि बिहारीपुर केवल इतिहास का साक्षी नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक जीवंत मिसाल भी है. यहां प्रसिद्ध दरगाह आला हज़रत, खानकाह-ए-नियाज़िया और आसपास स्थित धार्मिक स्थल वर्षों से सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे का संदेश देते आए हैं. यही कारण है कि यह इलाका धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से बरेली का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.
‘स्वाल-आलू’: बिहारीपुर की सबसे बड़ी पहचान
लेकिन बिहारीपुर की सबसे बड़ी पहचान है यहाँ का पारंपरिक नाश्ता स्वाल-आलू. मैदे से बनी बड़ी, कुरकुरी और खस्ता पापड़ी, जिसे स्थानीय भाषा में ‘स्वाल’ कहा जाता है, उसके साथ जीरा, नमक और हल्के मसालों से तैयार किए गए उबले आलू परोसे जाते हैं. इस सादगी भरे स्वाद ने स्वाल-आलू को बरेली की एक अनूठी पहचान बना दिया है. सुबह के समय लोग यहाँ खस्ता कचौड़ी, रसदार आलू की सब्जी और गरमा-गरम जलेबी का भी भरपूर आनंद लेते हैं.
70 साल पुराना स्वाद, सैलानियों की पहली पसंद
बिहारीपुर में हिटटी लाला की करीब 70 वर्ष पुरानी दुकान और विजय स्वीट्स, जो वर्ष 1965 से लोगों को पारंपरिक स्वाद परोस रही है, आज भी स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आने वाले पर्यटकों की पहली पसंद बनी हुई हैं.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें