बहुरूपिया कला! हर रूप में एक कहानी, लेकिन अब गुमनाम होती यह विरासत
भारत में बहुरूपिया कला की परंपरा बहुत पुरानी है. प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं के दरबारों में इन कलाकारों को सम्मान मिलता था. ये कलाकार वेशभूषा और स्वांग के ज़रिए ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक किरदारों का मंचन करते थे. लेकिन आज इस कला की पहचान और प्रतिष्ठा दोनों ही संकट में है.
फर्रुखाबाद में बहुरूपिया समुदाय से जुड़े कलाकारों का कहना है कि आज का समाज तेजी से इस कला से दूर होता जा रहा है. आधुनिकता, तकनीकी मनोरंजन और सोशल मीडिया की भरमार ने पारंपरिक कलाओं को हाशिए पर ला दिया है. लोग अब रूप बदलने वालों की असलियत में नहीं, बल्कि डिजिटल फिल्टर्स में अधिक रुचि रखते है.
धर्म से परे है इनकी कला
इस कला की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें कोई मजहबी भेदभाव नहीं है. मुस्लिम बहुरूपिए निःसंकोच शिव, राम या हनुमान जैसे हिंदू देवी-देवताओं का स्वरूप धारण करते है, वहीं हिंदू बहुरूपिए पीर, फकीर या सुल्तान बनकर प्रस्तुति देते है. यह कला एकता और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक है.
बहुरूपिया कलाकार आज भी शादी-ब्याह, मेलों और धार्मिक आयोजनों में अपनी कला का प्रदर्शन करते है और जो भी पैसे मिलते हैं, उसी से गुजर-बसर करते है. कुछ कलाकार पुलिस की पुरानी वर्दी पहनकर कॉमिक अभिनय करते है, तो कुछ ऐतिहासिक किरदारों को मंचित कर लोगों का मनोरंजन करते है. वे संवाद और हाव-भाव के ज़रिए दर्शकों को रोमांचित करते है.
देशभर में सिकुड़ती जा रही है यह परंपरा
एक अनुमान के मुताबिक भारत में करीब दो लाख बहुरूपिया कलाकार हैं, जिनमें से अधिकांश राजस्थान और उत्तर प्रदेश से आते हैं. लेकिन लगातार घटते मंच, घटती आमदनी और सामाजिक उपेक्षा के चलते यह कला अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है.
हमारी सांस्कृतिक धरोहर
बहुरूपिया कला सिर्फ एक मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर है. इसे बचाने और आगे बढ़ाने की ज़रूरत है. वरना वो दिन दूर नहीं जब यह विरासत सिर्फ किताबों और डॉक्युमेंट्रीज़ में ही सिमट कर रह जाएगी.