मुगलसराय के इस इलाके में 50 परिवारों को मिली नोटिस, लोगों का फूटा गुस्सा

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मुगलसराय के इस इलाके में 50 परिवारों को मिली नोटिस, लोगों का फूटा गुस्सा


चंदौली: जिले के मुगलसराय नगर पालिका क्षेत्र के वार्ड नंबर-21 सुभाष नगर स्थित एक पुराने तालाब की जमीन पर प्रशासन की कार्रवाई ने स्थानीय लोगों, जनप्रतिनिधियों और प्रभावित परिवारों के बीच बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है. तालाब की भूमि की पैमाइश के दौरान करीब 50 लोगों को नोटिस दिए जाने के बाद इलाके में तनाव का माहौल है.

एक ओर प्रशासन तालाब की जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने की तैयारी में जुटा है, तो दूसरी ओर स्थानीय सभासद और प्रभावित लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि यह जमीन तालाब की थी, तो वर्षों पहले रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज, नक्शा पास, बिजली-पानी और बैंक से लोन जैसी प्रक्रियाएं आखिर कैसे पूरी हुई? पूरे मामले में राजस्व विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है.

तालाब की पैमाइश के बीच बढ़ी हलचल
दरअसल, मुगलसराय के वार्ड नंबर-21 सुभाष नगर में स्थित तालाब की भूमि की पैमाइश कानूनगो और लेखपाल की मौजूदगी में की गई. प्रशासन का दावा है कि तालाब की जमीन पर अतिक्रमण हुआ है, जिसे हटाने की कार्रवाई की जाएगी. इसी क्रम में लगभग 50 लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं. नोटिस मिलने के बाद प्रभावित परिवारों में चिंता बढ़ गई है. कई लोगों का कहना है कि उनके मकान 20 से 25 वर्ष पुराने हैं और उन्होंने सभी सरकारी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद ही जमीन खरीदी थी.

तालाब बचाने का काम
स्थानीय सभासद आरती यादव ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि तालाब को लेकर विवाद नया नहीं है. उनके अनुसार, इस मामले में एक-दो साल पहले ही नोटिस जारी किए गए थे और यह मामला हाईकोर्ट में भी विचाराधीन है. उन्होंने दावा किया कि जब वह वर्ष 2017 में सभासद बनीं, उससे पहले ही क्षेत्र में प्लॉटिंग शुरू हो चुकी थी. उनके कार्यकाल में तालाब को बचाने की पहल की गई और नगर पालिका को 78 डिसमिल तालाब की जमीन वापस मिली. आरती यादव ने कहा कि उनके प्रयास से तालाब की खुदाई कराई गई, घाट का निर्माण कराया गया और तालाब का स्वरूप फिर से विकसित किया गया. इसका प्रमाण उनके पास उपलब्ध है और उस समय अखबारों में भी यह खबर प्रकाशित हुई थी.

‘जब घर बने तब प्रशासन कहां था?’
सभासद ने प्रशासन और राजस्व विभाग पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन लोगों को आज नोटिस मिल रहा है, उनके मकान दो दशक से अधिक पुराने हैं. उन्होंने पूछा कि यदि यह भूमि तालाब की थी, तो उस समय तत्कालीन प्रशासन, कानूनगो, लेखपाल और तहसील प्रशासन ने रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज और अन्य प्रक्रियाओं को कैसे पूरा होने दिया? यदि जमीन विवादित थी, तो नक्शा कैसे पास हुआ और निर्माण कैसे होता रहा? उन्होंने कहा कि बिना राजस्व विभाग की रिपोर्ट के न तो रजिस्ट्री होती है और न ही दाखिल-खारिज की प्रक्रिया पूरी होती है.

नगर पालिका की सुविधाओं पर भी उठे सवाल
आरती यादव ने कहा कि तालाब क्षेत्र में सड़कें बनीं, इंटरलॉकिंग बिछाई गई, बिजली के खंभे लगाए गए और नगर पालिका की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गईं. उन्होंने सवाल किया कि यदि पूरा क्षेत्र तालाब की भूमि थी, तो इन सभी सरकारी कार्यों की अनुमति किस आधार पर दी गई? उनका कहना था कि नगर पालिका वर्षों से यहां से कर भी वसूलती रही है और बिजली विभाग भी नियमित बिल लेता रहा है. कई लोगों ने बैंक से इसी जमीन के आधार पर ऋण भी लिया है.

‘राजनीतिक साजिश का बनाया जा रहा है हिस्सा’
सभासद ने आरोप लगाया कि पूरे मामले को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है. उन्होंने कहा कि जिस समय तालाब का पानी सूखा था, तब घाट निर्माण के लिए लगभग 40 लाख रुपये का टेंडर स्वीकृत हुआ था. निर्माण कार्य शुरू होने से पहले बच्चे वहां क्रिकेट खेलते थे, जिसे अब राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि घाट बनाने के लिए पहले पानी निकालना जरूरी था और उसी दौरान मैदान जैसा स्वरूप बनने पर बच्चों ने वहां खेला था. इसे गलत तरीके से प्रचारित किया जा रहा है.

‘सिर्फ एक ही रकबा क्यों निशाने पर?’
आरती यादव ने कहा कि विवादित रकबा संख्या 219 को ही निशाना बनाया जा रहा है, जबकि स्थानीय लोगों के अनुसार इस क्षेत्र में पहले 9 तालाब थे और सरकारी अभिलेखों में 7 तालाब दर्ज हैं. उन्होंने मांग की कि यदि प्रशासन तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराना चाहता है, तो पूरे नगर क्षेत्र के सभी तालाबों की पहचान कर समान रूप से कार्रवाई करे. उनका कहना था कि पूरे मुगलसराय में 51 तालाब बताए जाते हैं. यदि कार्रवाई करनी है, तो सभी तालाबों पर समान नियम लागू होने चाहिए.

‘हमने पूरी जिंदगी की कमाई लगा दी’
प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी लगाकर मकान बनाए हैं. स्थानीय निवासी मुन्नी देवी ने लोकल 18 से बताया कि क्षेत्र में कई दशक पहले से मकान बने हुए हैं. यदि जमीन तालाब की थी, तो उस समय अधिकारियों ने रजिस्ट्री और दाखिल-खारिज क्यों होने दिया? उन्होंने कहा कि गरीब परिवारों के लिए मकान ही सबसे बड़ी पूंजी होती है. यदि मकान गिरा दिया गया, तो उनके सामने रहने का संकट खड़ा हो जाएगा.

2013 में खरीदी गई जमीन पर भी संकट
स्थानीय निवासी शरद कुमार सिंह ने लोकल 18 से बताया कि उनके पिता ने वर्ष 2013 में तालाब के पीछे स्थित जमीन खरीदी थी. जमीन खरीदते समय सभी आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध थे. अब प्रशासन की कार्रवाई के बाद उनके जैसे कई परिवार असमंजस में हैं कि यदि जमीन सरकारी अभिलेखों में तालाब थी, तो उस समय खरीद-बिक्री की अनुमति कैसे मिली.

राजस्व विभाग की भूमिका पर सबसे बड़े सवाल
पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू राजस्व विभाग की भूमिका बनकर सामने आया है. स्थानीय लोगों का कहना है कि बिना लेखपाल, कानूनगो और तहसील प्रशासन की रिपोर्ट के न तो रजिस्ट्री संभव है और न ही दाखिल-खारिज. लोगों का आरोप है कि यदि वर्षों पहले सरकारी अभिलेखों के आधार पर सभी प्रक्रियाएं पूरी हुईं, तो अब उन्हीं लोगों को अतिक्रमणकारी घोषित करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता.

न्यायालय के फैसले पर टिकी है सबकी नजर
फिलहाल प्रशासन तालाब की जमीन की पैमाइश कर रहा है और आगे की कार्रवाई की तैयारी में है. दूसरी ओर प्रभावित परिवार कानूनी लड़ाई की बात कह रहे हैं. कई लोगों का दावा है कि उनके पास वैध दस्तावेज हैं और मामला न्यायालय में भी लंबित है. अब सबकी नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई और न्यायालय के फैसले पर टिकी है.

सरकारी व्यवस्था पर खड़े कर दिए हैं गंभीर सवाल
बता दें कि मुगलसराय के सुभाष नगर स्थित तालाब का मामला केवल अतिक्रमण हटाने तक सीमित नहीं रह गया है. इस विवाद ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली, वर्षों तक चली प्रशासनिक प्रक्रियाओं और सरकारी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. एक तरफ तालाबों को बचाना पर्यावरण और सार्वजनिक हित के लिए जरूरी है. वहीं, दूसरी ओर उन परिवारों का भविष्य भी दांव पर है, जिन्होंने सरकारी दस्तावेजों के आधार पर जमीन खरीदकर अपने घर बसाए, ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती प्रशासन के सामने यही है कि तालाब संरक्षण और आम नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए.



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