छांगुर बाबा पर विपक्ष क्यों हैं मौन? राहुल-अखिलेश ने साधी चुप्पी… उठे कई सवाल, आखिर माजरा क्या है?
भारत में सबसे बड़ी दुख की बात यह है कि जब किसी अपराध में पीड़ित हिंदू महिला होती है और आरोपी किसी अन्य धर्म से जुड़ा होता है, तो तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता, संगठन और पार्टियां जैसे कांग्रेस, ओवैसी, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड चुप क्यों हो जाते हैं?
गौरतलब है कि आरोपी जलालुद्दीन उर्फ छांगुर बाबा के खिलाफ पहले से कई शिकायतें और मुकदमे दर्ज हैं. जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं कि अलग-अलग जाति और धर्म की लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराने पर गिरोह को लाखों रुपये मिलते थे. ब्राह्मण, क्षत्रिय और सिख लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराने पर गिरोह को 15-16 लाख रुपये, पिछड़ी जातियों की लड़कियों के लिए 10-12 लाख और अन्य के लिए 8-10 लाख रुपये तक मिलते थे.
राजनीतिक स्वार्थ और वोट बैंक की राजनीति
राजनीति के जानकारों के अनुसार, भारत में लंबे समय से वोट बैंक की राजनीति के चलते कई राजनीतिक दलों ने कुछ खास समुदायों के अपराधों पर चुप्पी साधने की रणनीति अपनाई है. जब कोई अपराधी अल्पसंख्यक होता है, तो कुछ नेता बयान देने से डरते हैं कि कहीं उन्हें सांप्रदायिक न कहा जाए. लेकिन जब अपराधी हिंदू हो, तब वही नेता तुरंत प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया और सड़कों पर उतर आते हैं. ये तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता जब आरोपी हिंदू होता है तो जोरदार बयान देते हैं, लेकिन जब आरोपी मुस्लिम हो और पीड़ित हिंदू महिला, तब वे चुप हो जाते हैं. क्योंकि उन्हें डर होता है कि बयान देने से उनका ‘सेक्युलर चेहरा’ बिगड़ सकता है या वोट बैंक नाराज हो सकता है।
वहीं हिंदू संगठनों का आरोप है कि कांग्रेस और कुछ अन्य पार्टियां खुद को अल्पसंख्यकों की हितैषी दिखाने में लगी रहती हैं. पिछले कुछ सालों में कई हिंदू संतों पर रेप के आरोप लगे और कई संत जेल भी गए. कांग्रेस ने जोरदार तरीके से इस मुद्दे को उठाया भी जिसकी तारीफ भी होनी चाहिए. लेकिन जैसे ही पीड़िता हिंदू हो, तब कांग्रेस का आक्रामक तेवर कुंद पड़ जाता है. उनकी सेक्युलर छवि को नुकसान पहुंच सकता है. इसलिए वे ऐसे मामलों में चुप रहना ज्यादा मुनासिब समझते हैं.
“छांगुर बाबा” जैसे मामलों में खामोशी क्यों?
अब कुछ देर के लिए इस केस को थोड़ा बदल देते हैं. मान लेते हैं कि छांगुर बाबा हिंदू होता और भगवा कपड़े पहनने वाला होता, तो सोशल मीडिया से लेकर संसद तक हंगामा मच जाता. मशहूर लेखक अवॉर्ड वापस करते, महिला संगठनों की मानव श्रृंखलाएं बनतीं, और विदेशी मीडिया तक खबरें छा जातीं. लेकिन अब क्योंकि आरोपी मुस्लिम है और पीड़ित हिंदू महिलाएं हैं, इसलिए सभी तथाकथित सेक्युलर लोग, संगठन और राजनीतिक दल चुप हैं।
जब पीड़िता हिंदू होती है और आरोपी किसी अल्पसंख्यक समुदाय से होता है, तो देश में सन्नाटा छा जाता है. क्योंकि किसी भी पार्टी को वोट बैंक गंवाने का डर होता है, और किसी को सेक्युलर छवि बिगड़ने का. इसलिए ना संसद में हंगामा होता है, ना सड़क पर प्रदर्शन, और ना ही मानवाधिकार संगठन कोई आवाज़ उठाते हैं।
मुस्लिम वोट बैंक पर सब पार्टियों की नजर
चुनाव विश्लेषकों के अनुसार, 543 में से 70 से 90 लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर हार-जीत को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं. इनमें से लगभग 30-40 सीटें ऐसी होती हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20% से ज्यादा है. वैसे तो भारत में सभी राज्यों को मिलाकर 4,120 विधानसभा सीटें हैं, उनमें से लगभग 150-200 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक माने जाते हैं. इनमें से कई सीटें उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में हैं. चूंकि आम धारणा यह है कि मुस्लिमों का वोट एकतरफ जाता है, इसलिए कोई भी दल यह वोटबैंक खोना नहीं चाहता.