धोबी की एक गलती… और खुल गया काकोरी रेल एक्शन का राज! क्रांतिकारियों तक ऐसे पहुंची ब्रिटिश पुलिस
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उत्तर प्रदेश के काकोरी में 9 अगस्त, 1925 को भारतीय क्रांतिकारियों ने एक ऐतिहासिक रेल एक्शन को अंजाम दिया था. जिसे काकोरी रेल एक्शन के नाम से जाना जाता है. हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के नेतृत्व में क्रा…और पढ़ें
इतिहासकार डॉ. विकास खुराना ने बताया कि भारत मां के पैरों पड़ी गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए क्रांति की तीन धाराएं उठी. पहली सन 1857, दूसरी 1922 से 1931 तक और तीसरी 1940 के बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में. इनमें से दूसरी क्रांति की धारा का नेतृत्व शाहजहांपुर ने किया था. जब गांधी जी के असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने देश के प्रसिद्ध क्रांतिकारी नेता शचींद्रनाथ सान्याल के साथ मिलकर हिंदुस्तान प्रजातांत्रिक संगठन की स्थापना की. संगठन का उद्देश्य था भारत में सशस्त्र क्रांति के बल पर अंग्रेजों के शासन को उखाड़ फेंकना. ऐसे में शस्त्रों के लिए धन की आवश्यकता थी. जिसके बाद क्रांतिकारियों ने 9 अगस्त 1925 को 8 डाउन ट्रेन को रोककर उसमें से सरकारी खजाना लूट लिया गया.
चादर पर लगी मोहर से मिला था सुराग
रेल एक्शन को अंजाम देने के बाद सभी क्रांतिकारी अपने-अपने ठिकानों पर पहुंच गए. क्रांतिकारी मनमननाथ गुप्ता लखनऊ चले गए. सुबह की अखबार में रेल एक्शन की खबर छपी. गली में हॉकर आवाज लगा रहा था, ट्रेन लूट गई, ट्रेन लूट गई. खबर आग की तरह फैल गई. इसके बाद पुलिस हरकत में आई. पुलिस ने कड़ी से कड़ी को जोड़ना शुरु किया. रेल एक्शन के दौरान ट्रेन में छूटी क्रांतिकारियों की एक चादर, जिस पर शाहजहांपुर के एक धोबी की मोहर लगी हुई थी. पुलिस धोबी तक पहुंची और एक एक कर सभी क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिए गए.
काकोरी रेल एक्शन के बाद पुलिसिया जांच में तमाम लोगों के खिलाफ मुकदमें दर्ज किए गए. इसके अंतर्गत धारा 120बी, 123A और धारा 396 के तहत पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खान के साथ क्रान्तिकारी राजेंद्र लाहिड़ी को भी मौत की सजा सुनाई गई. काकोरी रेल एक्शन मामले में दोषी मानते हुए 19 दिसंबर 1927 को पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर, ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद (प्रयागराज) और अशफाक उल्ला खान को फैजाबाद जेल में फांसी दी गई.
राप्ती तट पर हुआ था बिस्मिल का अंतिम संस्कार
पंडित रामप्रसाद बिस्मिल को फांसी सुबह 6:30 बजे दी गई थी. फांसी से पहले उन्होंने अपनी आत्मकथा के लेखन का काम में जेल में ही पूरा किया था. उसके बाद उनके शव को जेल के पीछे की दीवार तोड़कर शव परिजनों को सौंपा गया था. और 20 दिसंबर को उनकी शवयात्रा में तकरीबन 20 लाख लोगों की भीड़ जुटी थी. उनका अंतिम संस्कार राप्ती नदी के किनारे वैदिक रीति-रिवाज से किया गया. इसी प्रकार ठाकुर रोशन सिंह जी का अंतिम संस्कार इलाहबाद (प्रयागराज) के संगम तट पर हुआ.