पॉपकॉर्न मशीन को देते है टक्कर! गाजीपुर के इस बुजुर्ग दंपति ने संभाली है बालू में दाना भुनने की सालों पुरानी परंपरा
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Ghazipur News: गाजीपुर के प्रसादपूर गांव में दाना भुजाई की पुरानी परंपरा आज भी जिंदा है. बुजुर्ग ब्रह्मदेव और उनकी पत्नी पारंपरिक मिट्टी और बालू के चूल्हे पर दाने भुनते हैं. यह सिर्फ खाने का जरिया नहीं, बल्कि ग…और पढ़ें
गाजीपुर: गाजीपुर के प्रसादपूर ग्राम की गलियों में अगर कभी कदम रखें, तो अचानक ही ताज़े भुने हुए दानों की खुशबू आपका ध्यान खींच लेगी. यह खुशबू सिर्फ भूख को जगाने वाली नहीं, बल्कि गांव की सांस्कृतिक परंपरा और सामूहिक जीवन का हिस्सा भी है. यहां दाना भुनना केवल खाने का तरीका नहीं, बल्कि यह गांववालों के मेल-जोल, रिश्तों और संस्कृति को जीवित रखने का एक तरीका भी है.
गांव के बुजुर्ग ब्रह्मदेव और उनकी पत्नी पुष्पा इस काम में किसी मशीन से कम नहीं हैं. दोनों पति-पत्नी बचपन से इस देसी भुजाई इंडस्ट्री से जुड़े हैं. ब्रह्मदेव मुस्कुराते हुए बताते हैं – “ये काम हमारे मां-बाप करते थे, हम भी वही कर रहे हैं, कम से कम 70–80 साल से यही सिलसिला चला आ रहा है.”
बेहद खास है भुजाई का प्रोसेस
यहां की भुजाई प्रक्रिया भी बिल्कुल खास है. जैसे आपने ठेले पर दाना भुनते देखा होगा, जहां नमक (काला नमक) डालकर चना या मक्का तपा दिया जाता है, वैसा नहीं. गांव में यह काम बालू से किया जाता है. मिट्टी के बड़े-बड़े चूल्हे पर लोहे की कड़ाही चढ़ाई जाती है, उसमें साफ बालू डालकर गरम किया जाता है और फिर उसी में लावा, चना, मकई या कुकड़ी का दाना डालकर खूब फटकनी से चलाया जाता है. कुछ ही देर में दाने भुनकर तैयार हो जाते हैं, और उनकी खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती है.
यहां की भुजाई प्रक्रिया भी बिल्कुल खास है. जैसे आपने ठेले पर दाना भुनते देखा होगा, जहां नमक (काला नमक) डालकर चना या मक्का तपा दिया जाता है, वैसा नहीं. गांव में यह काम बालू से किया जाता है. मिट्टी के बड़े-बड़े चूल्हे पर लोहे की कड़ाही चढ़ाई जाती है, उसमें साफ बालू डालकर गरम किया जाता है और फिर उसी में लावा, चना, मकई या कुकड़ी का दाना डालकर खूब फटकनी से चलाया जाता है. कुछ ही देर में दाने भुनकर तैयार हो जाते हैं, और उनकी खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती है.
हालांकि अब यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है. पहले हर गली-नुक्कड़ पर ऐसे चूल्हे जलते थे, लेकिन अब पॉपकॉर्न मशीनों और पैकेज्ड स्नैक्स ने जगह ले ली है. फिर भी, प्रसादपूर पूरा ग्राम का यह दाना भुजना हमें याद दिलाता है कि असली स्वाद सिर्फ खाने में नहीं, बल्कि उस “देसी अंदाज़” में छुपा है जिसमें पूरा गांव एक साथ सांस लेता है.
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