बलिया में आज भी हैं रंगरेज, अंग्रेजों के पहले से बिखेर रहे रंगों का जादू, जानिए इतिहास…

0
बलिया में आज भी हैं रंगरेज, अंग्रेजों के पहले से बिखेर रहे रंगों का जादू, जानिए इतिहास…


Last Updated:

Ballia News: बलिया के रंगरेज मोहम्मद नवाब अपने पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए कपड़ों को प्राकृतिक रंगों से नया जीवन देते हैं, जिससे क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर जीवित है.

सनन्दन उपाध्याय/बलिया: आपने एक गाना जरूर सुना होगा, हमरी न मानो रंगरेजवा पूछो, जिसने रंग दीन्हा दुपट्टा मेरा… बलिया में जहां एक ओर आधुनिकता की लहर चल रही है, वहीं दूसरी ओर यहां की गलियों और सड़कों के किनारे आज भी एक पुरानी और रंगीन परंपरा रंगरेजों की कला अक्सर देखने को मिल जाती है. यह परंपरा अंग्रेजों के जमाने से भी पहले की बताई जाती है और आज भी कुछ परिवार इस पेशे को न केवल अपनाए हुए हैं, बल्कि इसे गर्व से आगे बढ़ा रहे हैं. ये वही लोग हैं, जो रंगहीन कपड़ों में अपना जादू दिखाते हैं.

रंगरेज मोहम्मद नवाब ने कहा कि वह साधारण और बेरंग कपड़ों को अपने हुनर से इस तरह रंगते हैं कि वे एकदम नया जीवन पा जाते हैं. वे सूती, रेशमी और अन्य कपड़ों को प्राकृतिक और खास रंगों से इस कदर रंगते हैं कि हर कोई देखता रह जाता है. इनके द्वारा बनाए गए रंगीन दुपट्टे, चुनरी, कुर्ते और साड़ियां लोगों को खूब पसंद आती हैं. अक्सर लोग महंगे कपड़े खरीदने हैं, जो बीच में रंग छोड़ देने के कारण बेकार हो जाते हैं, लेकिन रंगरेज इन बेकार कपड़ों को खूबसूरत रंग देकर कामयाब बनाते हैं.

यहां मात्र कपड़े के हिसाब ₹60 से ₹90 में ही कपड़े नए बन जाते हैं और लोगों का पैसा भी वसूल हो जाता है. बताया कि यहां बहुत दूर – दूर से लोग कपड़े कलर कराने आते हैं, इसी से पूरे परिवार का भरण-पोषण हो जाता है. यह स्पेशल रंग होता हैं, जो कानपुर से ड्रम में मंगाया जाता है. कपड़े को रंगने के लिए सबसे गर्म पानी में रंग को पकाया जाता है, उसके फिल्टर डालकर कपड़े को नया रंग दिया जाता है. यहां हर रंग के कपड़े कलर किए जाते हैं.

उक्त रंगरेज का कहना है कि यह सिर्फ एक व्यवसाय नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की दी हुई उनके लिए धरोहर है. बताया कि इनके दादा-परदादा भी यही काम करते थे. उनके हाथों में जो कला थी, वही इन्हें विरासत में मिली है. आज भी बलिया के विभिन्न हिस्सों में रंगरेजों की मौजूदगी देखी जा सकती है, हर दिन इनकी मांग रहती है. बलिया के ये रंगरेज न केवल अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी जिंदा रखे हुए हैं, जो अपने आप में सराहनीय है. यह लोग खासकर जो कपड़े रंग छोड़ देते हैं, उसको रंगीन चमकदार और नया रूप देते हैं.

authorimg

Lalit Bhatt

मीडिया फील्ड में एक दशक से अधिक समय से सक्रिय. वर्तमान में News-18 हिंदी में कार्यरत. 2010 से नई दुनिया अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की. फिर हिंदुस्तान, ईटीवी भारत, शुक्रवार पत्रिका, नया इंडिया, वेबदुनिया समे…और पढ़ें

मीडिया फील्ड में एक दशक से अधिक समय से सक्रिय. वर्तमान में News-18 हिंदी में कार्यरत. 2010 से नई दुनिया अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की. फिर हिंदुस्तान, ईटीवी भारत, शुक्रवार पत्रिका, नया इंडिया, वेबदुनिया समे… और पढ़ें

न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें।
homeuttar-pradesh

बलिया में आज भी हैं रंगरेज, अंग्रेजों के पहले से बिखेर रहे रंगों का जादू



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *