लकड़ी से बुनते थे सपने, अब दो वक्त की रोटी भी मुश्किल, कारीगरों की पीड़ा
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फर्रुखाबाद के कारीगरों की कारीगरी पीढ़ियों से चली आ रही एक अनमोल विरासत है, जो लचीली लकड़ियों से बनी डलियों के लिए जानी जाती है. अरहर, बहेड़ा और शहतूत जैसी मजबूत और लचीली लकड़ियों से हाथों की कलाकारी से बनी ये …और पढ़ें
ब्लॉक कमालगंज के रजीपुर समेत कई गांवों में कारीगर अरहर, बहेड़ा और शहतूत जैसी लचीली लकड़ियों से हाथ से बनी डलिया तैयार करते हैं. ये डलिया न केवल खेतों और घरों में उपयोग होती हैं, बल्कि कई जिलों में इनकी बिक्री भी होती है. कभी ये कारीगर अच्छी कमाई करते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं.
स्थानीय बाजार में अरहर की खेती घटने के कारण अब लकड़ी की उपलब्धता भी सीमित हो गई है. मजबूरन इन कारीगरों को मध्यप्रदेश, महोबा और बुंदेलखंड जैसे इलाकों से लकड़ी खरीदनी पड़ती है, जिससे ट्रांसपोर्ट का खर्च भी जुड़ जाता है. एक डलिया बनाने में करीब ₹50 की लागत आती है, लेकिन बाजार में इसे अधिकतम ₹75 तक ही बेचा जा सकता है. दुकानदार अमित बताते हैं कि अब महीने भर की कमाई मुश्किल से ₹3,000 से ₹5,000 के बीच रह गई है, जिससे गुजारा करना भी मुश्किल हो गया है.
बदलते दौर में घटती मांग
प्लास्टिक की वस्तुओं की बढ़ती मांग ने भी इस व्यवसाय को प्रभावित किया है. पहले जहां अरहर की लकड़ी आसानी से मिल जाती थी, अब इसकी खेती कम हो गई है और जगह-जगह से लकड़ी लाना महंगा सौदा हो गया है. फिर भी, इन कारीगरों की मेहनत और लगन इस पारंपरिक कारीगरी को जिंदा रखने में जुटी है. यदि इन्हें सरकार या ‘एक जिला एक उत्पाद’ (ODOP) जैसी योजनाओं का पूरा लाभ मिले, तो यह कारीगरी एक बार फिर फर्रुखाबाद की पहचान बन सकती है.