अखिलेश को मिला मायावती साथ!, बीजेपी को घेरने के लिए इस मुद्दे पर दिया समर्थन
लखनऊ. उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने 2027 में प्रस्तावित जातीय जनगणना को लेकर केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधा है. दोनों नेताओं ने एक स्वर में जातीय जनगणना को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से कराने की मांग की है, जिससे भारतीय जनता पार्टी में हड़कंप मच गया है.
गौरतलब है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा ने गठबंधन किया था, जिसने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी. हालांकि, वह गठबंधन लंबे समय तक नहीं टिका. अब, 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों नेताओं का जातीय जनगणना पर एकसुर में बोलना सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह एकजुटता 2027 के लिए एक नई रणनीति का हिस्सा हो सकती है. अखिलेश की ‘PDA’ रणनीति, जिसमें पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट करने पर जोर है, ने 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को 37 सीटें दिलाई थीं. दूसरी ओर, मायावती की बसपा, जो हाल के चुनावों में कमजोर प्रदर्शन के बाद अपनी ज़मीन तलाश रही है, इस मुद्दे के जरिए दलित वोटों को फिर से गोलबंद करने की कोशिश में है.
भाजपा पर दबाव
2027 की सियासत की नींव
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव बेहद अहम माने जा रहे हैं. सपा और बसपा की यह एकजुट मांग न केवल जातीय जनगणना को लेकर है, बल्कि यह एक बड़े सामाजिक गठजोड़ की ओर भी इशारा कर रही है. अखिलेश की PDA रणनीति और मायावती की दलित-बहुजन राजनीति अगर एक मंच पर आती है, तो यह भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है. हालांकि, दोनों दलों के बीच पहले के गठबंधन का टूटना और आपसी अविश्वास अभी भी एक चुनौती है. 1995 में सपा कार्यकर्ताओं द्वारा मायावती पर कथित हमले की घटना को बसपा अक्सर याद करती है, जिसके कारण गठबंधन की राह आसान नहीं होगी.