अयोध्या के सैकड़ो मंदिरों में 5 दिन तक नहीं जाते पुजारी, क्या है बड़ी वजह, जानिए परंपरा
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अयोध्या के कुछ संत और महात्मा सखी भाव की उपासना परंपरा का पालन करते हैं. इस परंपरा में पुजारी स्वयं को सखी (स्त्री) के रूप में मानते हैं और भगवान राम को अपना पति स्वरूप मानकर उनकी सेवा-आराधना करते हैं.यह भाव भक्ति की उस अवस्था को दर्शाता है. जिसमें भक्त और भगवान के बीच का संबंध अत्यंत निजी और प्रेमपूर्ण हो जाता है.इसी सखी भाव के चलते एक विशेष नियम का पालन किया जाता है.
अयोध्या: अयोध्या की धार्मिक परंपराएं जितनी प्राचीन है उतनी ही अनोखी भी हैं. यहां के सैकड़ों मठ-मंदिरों में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है. जिसे जानकर लोग हैरान रह जाते हैं. हर महीने 5 दिन तक पुजारी मंदिर में प्रवेश नहीं करते. यह परंपरा आस्था, भाव और भक्ति की एक विशेष धारा से जुड़ी हुई है. अयोध्या में हजारों मठ-मंदिरों में भगवान राम और माता जानकी की पूजा होती है. इनमें से कई मंदिरों में माता जानकी को विशेष रूप से प्रथम स्थान दिया जाता है. यह परंपरा सीधे तौर पर मिथिला संस्कृति से जुड़ी मानी जाती है.जहां सीता जी का मायका है.
सखी भाव से उपासना करते हैं संत
दरअसल अयोध्या के कुछ संत और महात्मा सखी भाव की उपासना परंपरा का पालन करते हैं. इस परंपरा में पुजारी स्वयं को सखी (स्त्री) के रूप में मानते हैं और भगवान राम को अपना पति स्वरूप मानकर उनकी सेवा-आराधना करते हैं.यह भाव भक्ति की उस अवस्था को दर्शाता है. जिसमें भक्त और भगवान के बीच का संबंध अत्यंत निजी और प्रेमपूर्ण हो जाता है.इसी सखी भाव के चलते एक विशेष नियम का पालन किया जाता है. मान्यता के अनुसार महीने के पांच दिनों को “रजस्वला काल” माना जाता है.यानी मासिक धर्म का समय. इन दिनों में जैसे स्त्रियां पारंपरिक रूप से धार्मिक कार्यों से विराम लेती हैं.उसी तरह सखी भाव को मानने वाले पुजारी भी स्वयं को उसी स्थिति में मानते हुए मंदिर में प्रवेश नहीं करते हैं.
त्रेता युग से जुड़ी है परंपरा
महंत शशिकांत दास के अनुसार भगवान की पूजा केवल विधि से नहीं, बल्कि भाव से होती है यदि हृदय में सच्ची भावना न हो, तो पूजा अधूरी मानी जाती है. यही कारण है कि इस परंपरा में पुजारी पूरी निष्ठा से उस भाव को जीते हैं. जिसे वे मानते हैं यह परंपरा त्रेता युग से जुड़ी मिथिला संस्कृति का विस्तार मानी जाती है और आज भी अयोध्या के सैकड़ों मठ-मंदिरों में जीवंत रूप से निभाई जा रही है. यह केवल एक धार्मिक नियम नहीं बल्कि भक्ति के उस स्वरूप का उदाहरण है. जहां श्रद्धा और समर्पण सर्वोपरि होते हैं. महंत शशिकांत दास बताते हैं कि भगवान के साथ संतों के अपने-अपने भाव होते हैं .और भावना से ही भगवान की पूजा की जाती है .अगर हमारे हृदय में भाव नहीं है तो हम किसी भी तरह से ठाकुर जी को रिझा नहीं सकते. ऐसी स्थिति में अयोध्या में कुछ संतों की ऐसी मान्यता है जो शरण संप्रदाय से आते हैं जो सखी भाव को मानने वाले महात्मा है. सखी भाव को मानने वाले लोग भगवान को अपना पति मानते हैं.
इसलिए मंदिर नहीं जाते हैं संत
जिस तरह स्त्रियां अपने पति के साथ रहती हैं. उनकी सेवा आराधना करती हैं इस प्रकार अयोध्या के कई मठ मंदिर में प्रभु राम की पूजा आराधना पुजारी सखी बनाकर करते हैं. इतना ही नहीं महीने में जो 5 दिन का समय होता है. जिसे रजस्वला (मासिकधर्म) कहा जाता है. ऐसी भावना को मानने वाले लोग 5 दिनों तक भगवान के मंदिर में नहीं जाते हैं. और उसी भाव से रहते हैं जैसे वह अशुद्ध अवस्था में रहते हैं. यह परंपरा प्राचीन काल से निभाई जा रही है. यह परंपरा मिथिला का परंपरा है इस परंपरा के अनुसार अयोध्या के सैकड़ो मठ मंदिर में पांच दिनों तक पुजारी मंदिर में नहीं जाते हैं.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें