कभी शाहजहांपुर आने से डरते थे लोग! मच्छरों के कहर से उजड़ जाते थे गांव के गांव

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कभी शाहजहांपुर आने से डरते थे लोग! मच्छरों के कहर से उजड़ जाते थे गांव के गांव


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Shahjahanpur Malaria History: उत्तर प्रदेश का शाहजहांपुर जिला कभी ब्रिटिश हुकूमत के लिए डेथ ऑफ रीजन यानी मौत का इलाका माना जाता था. 19वीं सदी में यहां मलेरिया का कहर इतना भयावह था कि पूरे के पूरे गांव इस बीमारी की भेंट चढ़ जाते थे. इतिहासकार डॉ. विकास खुराना के अनुसार, घने जंगलों और दलदली जमीन के कारण यह क्षेत्र मच्छरों की प्रयोगशाला बन गया था. आज भले ही चिकित्सा विज्ञान ने काफी तरक्की कर ली हो, लेकिन शाहजहांपुर का यह इतिहास आज भी सोचने पर मजबूर कर देता है.

शाहजहांपुर: मलेरिया आज भले ही एक सामान्य बीमारी लगे. लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब उत्तर प्रदेश का शाहजहांपुर जिला मौत की प्रयोगशाला बन चुका था. अंग्रेजों के ज़माने में यहां की आबोहवा इतनी ज़हरीली मानी जाती थी कि ब्रिटिश दस्तावेजों में इसे ‘डेथ ऑफ रीजन’ यानी मौत का इलाका तक कह दिया गया था. जंगलों से घिरा और नम भूमि वाला यह क्षेत्र मच्छरों के लिए स्वर्ग और इंसानों के लिए नर्क के समान था. यहां हर साल हज़ारों लोग बुखार की तपिश में दम तोड़ देते थे.

इतिहासकार डॉ. विकास खुराना बताते हैं कि शाहजहांपुर को मलेरिया का घर कहना गलत नहीं होगा. यहां के उत्तर में स्थित घने जंगल और मानसून के बाद जमा होने वाला अवसाद का पानी मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों के पनपने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान था. 1901 तक जब तक इसका कोई पुख्ता इलाज नहीं मिला था. यहां मौतों का आंकड़ा डराने वाला था. इसी भयावहता को देखते हुए ब्रिटिश गजेटियर में इसे ‘रीजन ऑफ डेथ’ संबोधित किया गया. रोनाल्ड रॉस द्वारा मच्छर के लार्वा से इलाज खोजने के बाद ही इस कहर पर कुछ लगाम लग सकी. जिसके लिए उन्हें 1902 में नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया था.

इतिहास के पन्नों में आज भी दर्ज है दर्द
ब्रिटिश हुकूमत के दौरान शाहजहांपुर की भौगोलिक स्थिति ही इसकी दुश्मन बन गई थी. यहां की नम मिट्टी और तराई जैसा वातावरण मच्छरों को बेतहाशा बढ़ने का मौका देता था. डॉ. खुराना के अनुसार 1901 तक यहां की स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि लोग यहां आने से भी कतराते थे. सरकारी फाइलों में दर्ज आंकड़े बताते हैं कि मलेरिया की वजह से पूरा का पूरा गांव खाली हो जाता था. जिसे उस समय के इतिहासकारों ने बहुत करीब से महसूस किया था.

कुनैन जीवन की पहली किरण
जब मलेरिया ने हाहाकार मचाया तो विज्ञान ही ढाल बनकर सामने आया. उस दौर में सीतापुर आई हॉस्पिटल में कुनैन की छाल और डीडीटी पाउडर का वितरण मुफ्त में किया जाता था. 1910 के ब्रिटिश गजेटियर में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि कैसे लोगों को इस जानलेवा बीमारी से बचाने के लिए कुनैन को एकमात्र हथियार बनाया गया था. आज भी पुराने लोग उन दिनों को याद कर सिहर उठते हैं जब कुनैन ही आखिरी उम्मीद हुआ करती थी.

वैज्ञानिक सफलता और नोबेल का सम्मान
मलेरिया के खिलाफ जंग में रोनाल्ड रॉस का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है. उन्होंने मच्छर के पेट में मलेरिया के परजीवी की खोज की और साबित किया कि यह बीमारी मच्छरों के काटने से फैलती है. इस महान खोज ने शाहजहांपुर जैसे इलाकों के लिए संजीवनी का काम किया. 1901 में मिली इस कामयाबी के बाद ही उपचार की दिशा में बड़े कदम उठाए जा सके. इसी ऐतिहासिक उपलब्धि के लिए रॉस को चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था.

चुनौतियां अभी भी बरकरार
भले ही आज मलेरिया पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया है. लेकिन शाहजहांपुर के लिए मच्छरों का खतरा अभी टला नहीं है. डॉ. खुराना आगाह करते हैं कि अब मलेरिया की जगह डेंगू और अन्य मच्छर जनित बीमारियों ने ले ली है. आज भी भारी संख्या में लोग इन बीमारियों की चपेट में आकर अपनी जान गंवा रहे हैं. इतिहास हमें सिखाता है कि सफाई और जलभराव पर नियंत्रण ही इस ‘मौत के चक्र’ को तोड़ने का एकमात्र स्थाई समाधान है.

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Seema Nath

सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें



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