जब भक्त की गवाही देने खुद कोर्ट पहुंच गए थे बांके बिहारी, नजारा देख जज भी रह गए थे हैरान

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जब भक्त की गवाही देने खुद कोर्ट पहुंच गए थे बांके बिहारी, नजारा देख जज भी रह गए थे हैरान


मथुरा: योगीराज श्री कृष्ण सच में योगीराज हैं. जहां अन्याय होते देखते हैं, वहां न्याय करने पहुंच जाते हैं. भगवान श्री कृष्ण का एक ऐसा ही गरीब ब्राह्मण भक्त था. उस गरीब ब्राह्मण के ऊपर एक साहूकार के अत्याचार लगातार बढ़ रहे थे. गरीब ब्राह्मण ने साहूकार से कुछ पैसे अपनी बेटी की शादी के लिए. साहूकार के सारे पैसे गरीब ब्राह्मण ने चुका दिए.

लेकिन साहूकार के मन में बेईमानी आ गई. वह गरीब ब्राह्मण को अदालत में पहुंचा, तो योगीराज श्री कृष्ण ने उनकी किस तरह से मदद की. अदालत में गवाही देकर अपने भक्त को निर्दोष साबित कर दिया.

अपने एक भक्त की गवाही देने अलीगढ़ चले गये
भगवान बांके बिहारी की कृपा जिस भक्त पर हो जाती है, उस भक्त का कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता. ऐसा ही एक अनन्य भक्त बांके बिहारी का गरीब ब्राह्मण था. गरीब ब्राह्मण को अलीगढ़ की अदालत में जब पेश किया गया, तो ठाकुर जी ने लीला करते हुए, उस गरीब ब्राह्मण को बा इज्जत बरी कर दिया. आइये, जानते हैं भगवान बांके बिहारी की उस कहानी के बारे में.

लोकल 18 से बातचीत करते हुए पदम गोस्वामी ने बताया कि एक बार की बात है, भगवान बांके बिहारी का एक भक्त था. उस भक्त ने एक साहूकार से बेटी की शादी के लिए कुछ पैसे लिए. बेटी की शादी के बाद साहूकार के पैसे उस गरीब ब्राह्मण ने वापस कर दिए. साहूकार के मन में खोट आ गया और गरीब ब्राह्मण पर और पैसे निकाल दिए.

मामला कोर्ट पहुंच गया. गरीब ब्राह्मण बांके बिहारी को याद करते हुए अलीगढ़ कोर्ट में चला गया और वहां भगवान बांके बिहारी उस गरीब ब्राह्मण के पीछे-पीछे चल दिए. जज के सामने एक बच्चा पहुंच कर यह गवाही देता है, की गरीब ब्राह्मण ने सारे पैसे साहूकार के वापस कर दिए. साहूकार के मन में बेईमानी आ गई है, इसलिए गरीब ब्राह्मण को परेशान कर रहा है.

इतना कहकर जज के सामने से भगवान बांके बिहारी अंतर ध्यान हो गए. बाद में जब जज को ध्यान आया कि यह तो बांके बिहारी थे. उन्होंने कटघरे में खड़े होकर अपने भक्त के फेवर में गवाही दी, तो जज ने अपनी कलम तोड़ते हुए. उनसे पश्चाताप का आग्रह किया और वृंदावन की ओर चले आया.

इसलिए बार बार किया जाता है बांके बिहारी को पर्दा
पदम गोस्वामी ने लोकल 18 से बातचीत के दौरान यह भी बताया कि वह जज वृंदावन बांके बिहारी मंदिर की चौखट पर आकर अपना मत्था टेकता. बांके बिहारी से अपने द्वारा की गई भूल की क्षमा याचना करता. अंत समय जब आया, तो भगवान बांके बिहारी ने उस जज को गोलोक वास करते हुए अपने अंदर विलीन कर दिया. यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है. भक्त के बस में भगवान है. एक बार एक भक्त देखता रहा कि उसकी भक्ति के वशीभूत होकर श्री बांके बिहारी जी भाग गये.

पुजारी जी ने जब मन्दिर की कपाट खोला तो उन्हें श्री बांके बिहारी जी नहीं दिखाई दिये. पता चला कि वे अपने एक भक्त की गवाही देने अलीगढ़ चले गये हैं. तभी से ऐसा नियम बना दिया कि झलक दर्शन में ठाकुर जी का पर्दा खुलता एवं बन्द होता रहेगा.

ऐसी ही बहुत सारी कहानियां प्रचलित है. स्वामी हरिदासजी के द्वारा निधिवन स्थित विशाखा कुण्ड से श्री बांके बिहारी जी प्रकटित हुए थे. इस मन्दिर में कृष्ण के साथ श्रीराधिका विग्रह की स्थापना नहीं हुई. वैशाख मास की अक्षय तृतीया के दिन श्रीबाँकेबिहारी के श्रीचरणों का दर्शन होता है. पहले ये निधुवन में ही विराजमान थे. बाद में वर्तमान मन्दिर में पधारे हैं. यवनों के उपद्रव के समय श्री बांके बिहारी जी गुप्त रूप से वृन्दावन में ही रहे, बाहर नहीं गये.



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