जिस लालटेन की रोशनी में पढ़कर बने अफसर, आज वही इतिहास बनने की कगार पर

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जिस लालटेन की रोशनी में पढ़कर बने अफसर, आज वही इतिहास बनने की कगार पर


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Sultanpur News: जब पुराने जमाने में लोगों के घर बिजली से जगमग नहीं थे, तो लोग रोशनी के लिए आधुनिक उपकरणों का प्रयोग करते थे, जो आज विलुप्त हो चुके हैं. आज के लगभग 25-30 साल पहले गांव में लोगों के पास बिजली नाममात्र के लिए होती थी या फिर कई गांव ऐसे होते थे, जहां पर बिजली के तार आजादी के बाद पहुंचे ही नहीं थे.

सुल्तानपुर: वर्तमान समय में बिजली की उपलब्धता और कई तरह के नवाचार लोगों को कृत्रिम रोशनी प्रदान कर रहे हैं. बल्ब के आविष्कार, बिजली की उपलब्धता और कई तरह के अन्य रोशनी देने वाले आधुनिक उपकरणों ने आज के छात्र जीवन के साथ-साथ लोगों के दैनिक जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है, लेकिन आज के लगभग 25-30 साल पहले गांव में लोगों के पास बिजली नाममात्र के लिए होती थी या फिर कई गांव ऐसे होते थे, जहां पर बिजली के तार आजादी के बाद पहुंचे ही नहीं थे.

ऐसे में लोगों के जीवन और भविष्य को बनाने में पढ़ाई करने के लिए लालटेन और चिमनी ही एकमात्र सहारा होती थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बदला आज लोगों के पास सोलर लाइट विद्युत लाइट और अन्य तरह के रोशनी प्रदान करने वाले उपकरण मौजूद हैं. लेकिन वही लालटेन जो पहले छात्रों के पढ़ाई और लोगों के दैनिक जीवन में काम आती थी, आज विलुप्त सी हो गई है. आज कुछ ही घर ऐसे होंगे जहां पर लालटेन अपने पुराने स्वरूप में देखने को मिल सकती है, तो आज हम जानेंगे कि लालटेन का कितना महत्व था और किस तरह से यह लोगों के लिए काम करती थी.

बड़े पदों पर हैं आसीन
गांव के बुजुर्ग बजरंग बहादुर मिश्रा लोकल 18 से बताते हैं कि लालटेन के छात्रों के पढ़ाई में रोशनी प्रदान करने का एक मुख्य आधार हुआ करती थी. लालटेन के माध्यम से ही छात्र पढ़ते थे. वह बताते हैं कि उनके गांव में ही कई ऐसे छात्र हैं, जिन्होंने लालटेन के सहारे पढ़ाई की, आज वे देश दुनिया में कई बड़े पदों पर आसीन हैं और वह देश की सेवा कर रहे हैं. इसके साथ ही कई लोगों का जीवन लालटेन के ही सहारे उज्जवल हुआ है.

यहां से मिलता था तेल
बजरंग बहादुर मिश्र बताते हैं कि उनके बचपन में मिट्टी का तेल लालटेन जलाने के लिए राशन की दुकान यानि कि कोटेदार के यहां मिलता था. जैसे परिवार के सदस्यों की संख्या होती थी, उसी हिसाब से मिट्टी का तेल कोटेदार की ओर से प्रत्येक परिवारों को उपलब्ध कराया जाता था और उसी से शाम को चिमनी या फिर लालटेन जलाई जाती थी.

क्या होती थी लालटेन?
आपको बता दें कि लालटेन लोहे का एक ऐसा उपकरण होता था, जिसमें सूती कॉटन की बाती लगाई जाती थी और नीचे एक छोटा टैंक होता था, जिसमें मिट्टी का तेल भरा जाता था और बीच में कांच का शीशा होता था. जो वृताकार में होता था ताकि हवा लगने पर या ना बुझे और यही घर की रोशनी में अहम भूमिका निभाता था. लेकिन अब यह धीरे-धीरे लालटेन विलुप्त हो गया है और यह एक पारंपरिक वास्तु के रूप में ही लोगों के पास उपलब्ध है. यह सिर्फ स्मृतियों में लोगों को अपने बचपन की याद दिलाता है. आज भी कई लोग जब लालटेन को देखते हैं, तो वह अपने छात्र जीवन को याद करते हैं.

About the Author

आर्यन सेठ

आर्यन ने नई दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई की और एबीपी में काम किया. उसके बाद नेटवर्क 18 के Local 18 से जुड़ गए.



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