जौनपुर की वह ऐतिहासिक इमारत, जिसे लोग कहते हैं ‘ताजमहल की कॉपी’
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जौनपुर स्थित बारा दुआरिया, जिसे कालीच खान का मकबरा भी कहा जाता है, मुगलकालीन स्थापत्य कला का अनूठा नमूना है। इसे ताजमहल के प्रतिरूप के रूप में भी जाना जाता है. इतिहासकारों के अनुसार, इसका निर्माण मुगल साम्राज्य में इलाहाबाद के गवर्नर रहे कालीच खान ने कराया था. उनके नाम पर ही आसपास का गांव कलीचाबाद कहलाता है.
जौनपुर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल बारा दुआरिया, जिसे कालीच खान का मकबरा भी कहा जाता है, अपनी भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है. गोमती नदी के किनारे स्थित यह स्मारक मुगलकालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है. इसकी खूबसूरत बनावट और ऐतिहासिक महत्व के कारण इसे ताजमहल के प्रतिरूप के रूप में भी जाना जाता है. आज भी बड़ी संख्या में लोग इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने पहुंचते हैं.

इतिहासकारों के अनुसार बारा दुआरिया का निर्माण मुगल साम्राज्य में इलाहाबाद के गवर्नर रहे कालीच खान ने करवाया था. यह मकबरा उनकी स्मृति से जुड़ा हुआ है. कालीच खान मुगल शासन के प्रभावशाली अधिकारियों में गिने जाते थे. उनके द्वारा निर्मित यह स्मारक आज भी उस दौर की समृद्ध स्थापत्य कला और ऐतिहासिक विरासत की कहानी बयां करता है.

बारा दुआरिया के आसपास स्थित गांव का नाम कलीचाबाद भी कालीच खान के नाम पर ही पड़ा. स्थानीय लोगों और इतिहासकारों का मानना है कि इस क्षेत्र की पहचान कालीच खान से गहराई से जुड़ी हुई है. वर्षों बीत जाने के बावजूद गांव का नाम आज भी इतिहास की उस विरासत को जीवित रखे हुए है और लोगों को अपने गौरवशाली अतीत की याद दिलाता है.
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इस ऐतिहासिक मकबरे की सबसे बड़ी विशेषता इसके बारह द्वार हैं. इन्हीं द्वारों के कारण इस इमारत को बारा दुआरिया कहा जाता है. स्थापत्य कला की दृष्टि से यह संरचना बेहद खास मानी जाती है. इमारत की बनावट में मुगलकालीन शिल्पकला की झलक साफ दिखाई देती है, जो इसे अन्य ऐतिहासिक स्मारकों से अलग पहचान दिलाती है.

बारा दुआरिया की भव्यता और स्थापत्य शैली लोगों को ताजमहल की याद दिलाती है. इसकी सुंदर नक्काशी, विशाल गुंबद और कलात्मक निर्माण शैली इसे विशेष बनाते हैं. यही कारण है कि स्थानीय लोग इसे ताजमहल का प्रतिरूप भी कहते हैं. इतिहास प्रेमियों और पर्यटकों के लिए यह स्थल हमेशा आकर्षण का केंद्र बना रहता है.

इतिहास की अमूल्य धरोहर होने के बावजूद बारा दुआरिया लंबे समय से उपेक्षा का शिकार है. संरक्षण और नियमित देखरेख के अभाव में इस स्मारक के कई हिस्से प्रभावित हुए हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस धरोहर के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो इसकी ऐतिहासिक पहचान को नुकसान पहुंच सकता है.

जौनपुर का बारा दुआरिया पर्यटन की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि इस ऐतिहासिक स्थल का समुचित विकास और प्रचार-प्रसार किया जाए तो यह प्रदेश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। इससे न केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर भी मिल सकेंगे.

बारा दुआरिया केवल एक मकबरा नहीं, बल्कि जौनपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है. यह स्मारक मुगलकालीन इतिहास, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत को सहेजे हुए है. आज भी यह धरोहर जौनपुर के गौरवशाली अतीत की गवाही देती है और आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से जोड़ने का कार्य कर रही है.