दो भाई दोनों तबाही…कानपुर में खोजे गए करिश्माई बैक्टीरिया, साफ कर डालेंगे पूरी नदी

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दो भाई दोनों तबाही…कानपुर में खोजे गए करिश्माई बैक्टीरिया, साफ कर डालेंगे पूरी नदी


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Kanpur News : कानपुर से नदियों में पहुंचने वाला कपड़ा, चमड़ा और पेंट उद्योगों का डाईयुक्त जहरीला पानी सालों से समस्या बना हुआ है. इस परेशानी का समाधान कानपुर के एचबीटीयू ने खोज निकाला है. एचबीटीयू के वैज्ञानिकों ने ऐसे दो खास बैक्टीरिया विकसित किए हैं, जो औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले जहरीले पानी को फैक्ट्री के अंदर ही पूरी तरह साफ कर देंगे. प्रोफेसर डॉ. ललित कुमार सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि उद्योगों से निकलने वाले डाईयुक्त अपशिष्ट में करीब 97 प्रतिशत भारी रासायनिक अणु होते हैं. पहला बैक्टीरिया इन बड़े अणुओं को छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ देता है. इसके बाद दूसरा बैक्टीरिया उन हिस्सों को पूरी तरह खत्म कर देता है.

कानपुर. गंगा और उसकी सहायक नदियों में सालों से कपड़ा, चमड़ा और पेंट उद्योगों का डाईयुक्त जहरीला पानी बड़ी समस्या बना हुआ है. इससे न सिर्फ नदियां प्रदूषित होती हैं, बल्कि इंसानों की सेहत पर भी गंभीर असर पड़ता है. अब इस परेशानी का बड़ा समाधान कानपुर के हरकोर्ट बटलर प्राविधिक विश्वविद्यालय (एचबीटीयू) ने खोज निकाला है. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ऐसे दो खास बैक्टीरिया विकसित किए हैं, जो औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले डाईयुक्त जहरीले पानी को फैक्ट्री के अंदर ही पूरी तरह साफ कर देंगे. इससे प्रदूषित पानी गंगा या दूसरी नदियों तक पहुंचने से पहले ही शोधित हो जाएगा. एचबीटीयू के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. ललित कुमार सिंह और उनकी टीम ने इस तकनीक पर लगातार तीन वर्षों तक शोध किया. कई चरणों में हुए लैब परीक्षणों में यह तकनीक पूरी तरह सफल रही. यही वजह है कि इस शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक भविष्य में देशभर की औद्योगिक इकाइयों के लिए पर्यावरण संरक्षण का बड़ा हथियार बन सकती है.

दोनों बैक्टीरिया लगातार सक्रिय

लोकल 18 से प्रोफेसर डॉ. ललित कुमार सिंह ने बताया कि शोध के दौरान स्यूडोमोनास पुटिडा (Pseudomonas putida) और लाइसिनीबैसिलस स्फेरिकस (Lysinibacillus sphaericus) नाम के दो बैक्टीरिया मिले. इन दोनों की खासियत यह है कि ये एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करते हैं. उद्योगों से निकलने वाले डाईयुक्त अपशिष्ट में करीब 97 प्रतिशत भारी रासायनिक अणु होते हैं. पहला बैक्टीरिया इन बड़े अणुओं को छोटे-छोटे हिस्सों में तोड़ देता है. इसके बाद दूसरा बैक्टीरिया उन हिस्सों को पूरी तरह खत्म कर देता है. इस पूरी प्रक्रिया के बाद जहरीले रसायन समाप्त हो जाते हैं और पानी काफी हद तक साफ हो जाता है. सबसे खास बात यह है कि दोनों बैक्टीरिया लगातार सक्रिय रहते हैं और बिना किसी रासायनिक प्रक्रिया के अपना काम करते हैं.

कैंसर से राहत

विशेषज्ञों के अनुसार, डाईयुक्त अपशिष्ट सिर्फ नदियों को ही नहीं, बल्कि इंसानों के स्वास्थ्य को भी गंभीर नुकसान पहुंचाता है. ऐसे पानी के संपर्क में आने से कैंसर, त्वचा रोग, सांस संबंधी बीमारियां और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं. यदि उद्योग इस तकनीक को अपनाते हैं तो इन खतरनाक बीमारियों का खतरा भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा. साथ ही गंगा और दूसरी नदियों का पानी पहले की तुलना में अधिक स्वच्छ रहेगा.

फैक्ट्रियां कैसे करेंगी इस्तेमाल

प्रोफेसर ललित कुमार सिंह ने बताया कि इस तकनीक का उपयोग करना बेहद आसान है. उद्योगों को केवल अपने डाईयुक्त अपशिष्ट में इन बैक्टीरिया को मिलाना होगा. इसके बाद दोनों बैक्टीरिया अपने-आप जहरीले रसायनों को खत्म कर देंगे. इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें महंगे रसायनों की जरूरत नहीं पड़ती और यह पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू किया गया तो देशभर के कपड़ा, चमड़ा, पेंट और अन्य डाई आधारित उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषण में भारी कमी आएगी. इससे गंगा समेत देश की कई नदियों को प्रदूषण से बचाने में बड़ी मदद मिलेगी. एचबीटीयू की यह उपलब्धि न सिर्फ कानपुर बल्कि पूरे देश के लिए पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है.

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Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…

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