न विधाता को रहम आया, न सिस्टम ने खाया तरस, बलिया की किशोरिया देवी पर ये कैसी आफत?
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Ballia Ground Report : बलिया जिले में घाघरा न केवल कच्चे-पक्के मकानों को अपने साथ ले जा रही है, बल्कि कई परिवारों के सालों की मेहनत और सपनों को भी मलबे में बदल दिया है. किशोरिया की आंखों में दर्द साफ झलक रहा है. अब उम्र भी साथ नहीं दे रही है. लोकल 18 से किशोरिया कहती हैं कि रात 12 बजे जब चारों ओर सन्नाटा था, अचानक तेज कटान और घाघरा के पानी ने पलभर में मकान को अपनी आगोश में ले लिया. देखते ही देखते वर्षों की मेहनत पानी में विलीन हो गई. दोबारा पक्का घर बना पाएंगे, इसकी उम्मीद नहीं बची है. झुग्गी-झोपड़ी में ही बाकी जिंदगी काटनी पड़ेगी.
बलिया. यूपी के बलिया जिले में बाढ़ न केवल कच्चे-पक्के मकानों को अपने साथ ले जा रही है, बल्कि कई परिवारों के सालों की मेहनत और सपनों को भी मलबे में बदल दिया है. इन पीड़ितों का दर्द किसी को भी बेध सकता है. इन्हीं पीड़ितों में से एक बुजुर्ग की कहानी हर किसी के दिल को झकझोर देने वाली है. यह महिला नदी के किनारे बैठकर टूटी आवाज में कहती है कि यहीं मेरा पक्का मकान था, इसी आंगन में मेरा परिवार रहता था, जहां आज घाघरा नदी ने कब्जा कर लिया है. अब तो यहां केवल पानी और यादें ही रह गई हैं.
लोकल 18 से बुजुर्ग किशोरिया देवी बताती हैं कि सालों पहले उनके पति का बीमारी से निधन हो गया था. इसके बाद उन्होंने मेहनत-मजदूरी कर एक-एक रुपये जोड़कर अपना पक्का घर बनवाया था. इसी घर में बहू-बेटे समेत पूरा परिवार रहता था. रात 12 बजे जब चारों ओर सन्नाटा था, अचानक तेज कटान और घाघरा के पानी ने पलभर में मकान को अपनी आगोश में ले लिया. देखते ही देखते वर्षों की मेहनत पानी में विलीन हो गई. घर में रखा सबकुछ अचानक नजर से ओझल हो गया.
भावुक किशोरिया देवी बताती हैं कि इंसान घर इसलिए बनाता है कि उसके बच्चे कहीं से भी लौटें तो उनके सिर पर छत हो, दो वक्त की रोटी बनाकर सुकून से सो सकें. जीवन में घर और दो वक्त की रोटी से बड़ा कोई सपना नहीं. इसी के लिए लोग जीवनपर्यन्त खून पसीना बहाते हैं. लेकिन अब उनके पास तो न घर है और न कोई ठिकाना बचा है. समय का कालचक्र ऐसा घूमा कि जिंदगी ने एक ही बार फिर खुले आसमान के नीचे लाकर पटक दिया है. किशोरिया यहां रोज बैठकर रोती हैं.
यादों का सहारा
घर वाले समझा रहे हैं कि जाने दो, जो हो गया, आप रोकर भी बीमार पड़ जाएंगी. जब भी अपने आशियाने की याद आती है, वह इसी जगह आकर कुछ देर बैठ जाती हैं. ये जगह अब यादों का सहारा और मन को ढांढस बधाने का आधार बन चुका है. बुजुर्ग महिला की आंखों में दर्द साफ झलक रहा है. अब उम्र भी साथ नहीं दे रही है. किशोरिया कहती हैं कि दोबारा पक्का घर बना पाएंगे, इसकी उम्मीद नहीं बची है. अगर सरकार मदद कर दे तो सिर पर फिर से छत मिल सकती है. नहीं तो झुग्गी-झोपड़ी में ही बाकी जिंदगी काटनी पड़ेगी. अभी तक इधर कोई राहत सामग्री भी नहीं दी गई है.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…
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