अगर दिल में जुनून हो और परंपरा से जुड़ाव बना रहे, तो कोई भी काम बड़ी मिसाल बन सकता है. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है सुल्तानपुर के इकबाल ने, जिन्होंने अपने पुश्तैनी पेशे को न सिर्फ जिंदा रखा, बल्कि उसे अपनी मेहनत और …और पढ़ें
हाइलाइट्स
इकबाल ने पारंपरिक ढोल बनाने के काम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया.
विभिन्न लकड़ियों से ढोल बनाकर इकबाल महीने में हजारों कमाते हैं.
इकबाल ने सरकार से आवास और व्यवसाय के लिए सहयोग की मांग की.
सुल्तानपुर. अगर दिल में हौसला और जुनून हो तो कोई भी आदमी किसी भी काम को आसानी से कर सकता है. इसी का उदाहरण पेश किया है सुल्तानपुर के रहने वाले इकबाल, जिन्होंने अपने पारिवारिक व्यवसाय को संजोए रखा और आज वह महीने में हजारों रुपए की कमाई कर रहे हैं. दरअसल, इकबाल का परिवार कई पीढ़ियों से ढोल बनाने का व्यापार करता चला आ रहा है, जिसे इकबाल ने न सिर्फ जारी रखा बल्कि उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. आज वह इस काम से अच्छी खासी आमदनी कमा रहे हैं. तो आइए जानते हैं इकबाल की सफलता का क्या है राज..?
पारंपरिक काम को संजोए रखा लोकल 18 से बातचीत के दौरान इकबाल ने बताया कि उन्होंने ढोल बनाने का काम खुद से शुरू नहीं किया था, बल्कि यह उनका पारंपरिक पारिवारिक व्यवसाय है. यह कला उन्हें उनके पूर्वजों से विरासत में मिली है. इकबाल ने बताया कि उन्होंने अपने बुजुर्गों से यह हुनर सीखा और अब उसी कौशल का इस्तेमाल करते हुए वे कई तरह के ढोल बनाने में पूरी तरह निपुण हो गए हैं.
इन लकड़ियों का करते हैं इस्तेमाल इकबाल ने बताया कि ढोल बनाने के लिए वे आम, शीशम और महुआ जैसी विभिन्न प्रकार की लकड़ियों का इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा ढोल में लगने वाले अन्य कच्चे माल को वे कानपुर और बाराबंकी की चुनिंदा बाजारों से खरीदते हैं. सभी सामग्री को जुटाकर वे ढोल तैयार करते हैं. उन्होंने बताया कि एक ढोल को बनाने में करीब 400 से 500 रुपए तक की लागत आती है, जबकि प्रति ढोल उन्हें 100 से 150 रुपये तक का मुनाफा होता है.
परिवार का रहता है सहयोग वैसे तो इकबाल मूल रूप से गोंडा जिले के रहने वाले हैं, लेकिन पिछले कई साल से वे सुल्तानपुर में रहकर ढोल बनाने का काम कर रहे हैं. उनके इस पारंपरिक व्यवसाय में उनकी पत्नी, बच्चे और अन्य परिजन भी उनका सहयोग करते हैं. हालांकि ढोल और अन्य वाद्य यंत्रों की अधिक बिक्री न होने के कारण उन्हें इस व्यापार से उतना मुनाफा नहीं हो पाता, जितना कि आज की महंगाई में आवश्यक है. ऐसे में इकबाल ने सरकार से गुहार लगाई है कि उन्हें रहने के लिए आवास मुहैया कराया जाए और उनके पारंपरिक व्यवसाय को सरकारी सहयोग प्राप्त हो, ताकि यह कला और विरासत आगे भी जीवित रह सके.