फल छेदक, कटुआ कीट, यलो वेन मोजेक वायरस भिंडी के लिए खतरनाक, एक्सपर्ट ने दिये बचाव टिप्स
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कृषि वैज्ञानिक डॉ. सीके त्रिपाठी ने भिंडी में एक चरण रोग, फल छेदक, कटुआ कीट और यलो वेन मोजेक वायरस से बचाव के लिए सल्फर, कैराथीन, थियामेथोक्सम, इमिडाक्लोप्रिड, क्युनालफॉस व एसितामाइप्रिड छिड़काव की सलाह दी.कृषि विज्ञान केंद्र सुलतानपुर में कार्यरत कृषि वैज्ञानिक बताते हैं यह उस समय पत्तियों पर असर करता है, जब मौसम सूखा होता है. इस रोग के आने के बाद पत्तियों पर सफेद रंग की आटे की तरह एक परत आ जाती है. उसके बाद भिंडी के फल टेढ़े-मेढ़े बनने लगते हैं.
कृषि विज्ञान केंद्र सुलतानपुर में कार्यरत कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर सीके त्रिपाठी बताते हैं कि एक चरण रोग होता है. यह उस समय पत्तियों पर असर करता है, जब मौसम सूखा होता है. इस रोग के आने के बाद पत्तियों पर सफेद रंग की आटे की तरह एक परत आ जाती है. उसके बाद भिंडी के फल टेढ़े-मेढ़े बनने लगते हैं.

डॉ. त्रिपाठी आगे बताते हैं कि इस रोग का लक्षण पहचान के लिए सबसे पहले हमें भिंडी के पौधों की पत्तियों पर ध्यान देना होगा क्योंकि इसमें पत्तियां धीरे-धीरे गिरने लगती हैं. इस रोग को नियंत्रित करने के लिए सल्फर पाउडर 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना है या फिर 6ml कैराथीन को प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव कर सकते हैं. ऐसा करने से रोग नियंत्रित हो जाता है.

भिंडी की फसल में दवा का छिड़काव करने का सही समय कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि फसल में 15 दोनों के अंतराल पर छिड़काव करना चाहिए. 15 दिनों के अंतराल पर भिंडी की फसल पर दवा का छिड़काव करने से रोग और कीटों का प्रभाव नहीं पड़ने पता है और इससे फसल सुरक्षित रहती है लेकिन इस अंतराल को रोग और दवा की क्वालिटी के हिसाब से करना चाहिए.
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भिंडी की फसल में फल छेदक कीट तेजी से नुकसान पहुंचाता है. यह कीट फल के अंदर घुसकर उसमें अंडे दे देता है और तेजी से अपनी संख्या में वृद्धि करता है, जिससे फसल बर्बाद होने लगती है. तेजी से संख्या बढ़ता है. फल छेदक कीट न सिर्फ सामान्य भिंडी के पौधों को प्रभावित करते हैं बल्कि यह खेत में लगे अन्य पौधों पर भी अपना प्रभाव जमाने लगते हैं और यह धीरे-धीरे पूरी फसल में फेल कर फसल को चौपट कर देते हैं.

डॉ सी के त्रिपाठी ने आगे बताया कि भिंडी की फसल में जब 5 से 10% फूल निकल जाते हैं. उसी समय 1 ग्राम थियामेथोक्सम प्रति 3 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर दें. रोग नियंत्रित हो जाता है. 15 दिनों के बाद इमिडाक्लोप्रिड या क्युनालफॉस का छिड़काव करने से भी रोग पर नियंत्रण बना रहता है.

भिंडी में लगने वाला कटुआ कीट बहुत तेजी से नुकसान करता है. यह पौधे के तने को काटता है. जिसके बाद पौधा नीचे गिर जाता है. हालांकि यह कीट जल्दी नहीं लगने पाता लेकिन यह अन्य कीटों की अपेक्षा काफी खतरनाक साबित होता है इसलिए इसका नियंत्रण अवश्य होना चाहिए. अगर आपके भी भिंडी की फसल में इस तरह की किट के लक्षण दिखाई दे रहे हैं तो आपको सावधान होने की आवश्यकता है.

इसके नियंत्रण के लिए आवश्यक है कि मिट्टी में मिलाने वाले कीटनाशकों का इस्तेमाल करना चाहिए. डॉक्टर सीके त्रिपाठी आगे बताते हैं कि ने बथाइमेट-1 जी और कार्बोफ्यूरान 3जी 10 किलो प्रति एकड़ के हिसाब से मिट्टी में मिला देना है जिससे कटुवा कीट के प्रकोप से फसल को बचाया जा सकता है. और किसानों को होने वाले नुकसान को भी रोका जा सकता है.

यह रोग यलो वेन मोजेक वायरस के नाम से भी जाना जाता है. यह रोग सफेद मक्खियों के द्वारा फैलता है. इस रोग में पत्तियों पर पीले धब्बे होने लगते हैं. जब रोग बढ़ने लगता है तो फल भी पीले होने लगते हैं. इस रोग से ग्रस्त पौधों का विकास रुक जाता है. बारिश में इस रोग का प्रकोप अधिक होता है. इससे बचने के लिए पौधों में फूल आने से पहले एवं बाद में प्रति एकड़ खेत में 60 ग्राम एसितामाइप्रिड 20 एसपी का छिड़काव करेना चाहिए.