बथुआ से खुरंड तक…रोपाई के 20 दिन बाद धान में ये कैसी आफत? तुरंत करें ये काम
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Paddy Farming Tips : धान की फसल में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार पैदावार को 30 से 40 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं. इन खरपतवारों का प्रबंधन शुरुआती 20 से 35 दिनों के भीतर करना जरूरी है. शाहजहांपुर के किसान रनजोद सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि किसानों को केवल रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय हाथ से निराई-गुड़ाई, उचित जल प्रबंधन और प्रमाणित बीजों का उपयोग करना चाहिए. रनजोद सिंह के मुताबिक, धान के खेतों में आमतौर पर कई तरह के चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार उगते हैं जो फसल के विकास को रोकते हैं. ये खरपतवार धान की रोपाई के तुरंत बाद सक्रिय हो जाते हैं.
शाहजहांपुर. धान की खेती करने वाले किसानों के लिए चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार बड़ी चुनौती रहे हैं. यह अनचाहे पौधे न केवल धान के पौधों के साथ पोषक तत्वों, पानी और धूप के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, बल्कि फसल के उत्पादन को भी भारी नुकसान पहुंचाते हैं. सही समय पर और सही विधि से इन खरपतवारों का नियंत्रण न किया जाए, तो धान की पैदावार में 30 से 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है. शाहजहांपुर के किसान रनजोद सिंह लोकल 18 से बताते हैं कि धान की फसल में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों का प्रबंधन शुरुआती 20 से 35 दिनों के भीतर करना सबसे अधिक प्रभावी होता है.
अंधाधुंध छिड़काव घातक
किसानों को केवल रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय एकीकृत खरपतवार प्रबंधन (IWM) अपनाना चाहिए. इसमें हाथ से निराई-गुड़ाई, उचित जल प्रबंधन और प्रमाणित बीजों का उपयोग शामिल है. रासायनिक नियंत्रण के लिए बिस्पायरीबैक-सोडियम या मेटसल्फ्यूरॉन-मिथाइल जैसी दवाओं का छिड़काव नमी वाले खेतों में करना चाहिए. अंधाधुंध छिड़काव से बचें, क्योंकि इससे खरपतवारों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है और मिट्टी की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है.
फैलवा बहुत तेज
रनजोद सिंह के मुताबिक, धान के खेतों में आमतौर पर कई तरह के चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार उगते हैं जो फसल के विकास को रोकते हैं. इनमें प्रमुख रूप से ‘बथुआ’ (Chenopodium album), ‘खुरंड’ (Chrozophora rottleri), ‘मिरचिया’, ‘केंकवा’ (Commelina benghalensis) और ‘जलकुंभी’ या ‘पानी की बूटियां’ शामिल हैं. ये खरपतवार धान की रोपाई के तुरंत बाद सक्रिय हो जाते हैं. इनकी पत्तियां चौड़ी होने के कारण ये बहुत तेजी से फैलते हैं और कम समय में ही पूरे खेत को अपनी चपेट में ले लेते हैं, जिससे मुख्य फसल की ग्रोथ प्रभावित होती है.
कीटों के छिपने की जगह
ये चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार धान के पौधों को मिलने वाले जरूरी पोषक तत्वों जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश को सोख लेते हैं. क्योंकि इनकी पत्तियां बड़ी होती हैं, ये धूप को रोक लेते हैं जिससे धान के पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया धीमी हो जाती है. इसके अलावा, ये हानिकारक कीटों को छिपने की जगह देते हैं. इसके परिणामस्वरूप धान के पौधे कमजोर हो जाते हैं, उनमें कल्ले कम निकलते हैं और अंततः अनाज की गुणवत्ता और मात्रा दोनों खराब हो जाती है. खरपतवारों से निपटने के लिए पारंपरिक और यांत्रिक विधियां बेहद सुरक्षित और टिकाऊ मानी जाती हैं. फसल की बुआई या रोपाई से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई करने से शुरुआती खरपतवार नष्ट हो जाते हैं. रोपाई के बाद शुरुआती 3-4 हफ्तों तक खेत में 4-5 सेंटीमीटर पानी जमा रखने से चौड़ी पत्ती वाले बीजों को अंकुरित होने का मौका नहीं मिलता है.
रासायनिक नियंत्रण कब करें
रनजोद सिंह बताते हैं कि जब खरपतवारों का प्रकोप बहुत ज्यादा हो, तब रासायनिक खरपतवार नाशक का छिड़काव करना सबसे बेहतर है. धान की रोपाई के 20-25 दिनों बाद जब खरपतवार 2 से 4 पत्तियों के हों, तब ‘मेटसल्फ्यूरॉन मिथाइल + क्लोरीम्यूरॉन इथाइल’ (Almix) की 8 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ की दर से छिड़काव करें. छिड़काव करते समय खेत में पर्याप्त नमी का होना जरूरी है, लेकिन पानी भरा हुआ नहीं होना चाहिए. हमेशा फ्लैट फैन नोजल से ही छिड़काव करें ताकि दवा का समान रूप से फैलाव हो सके.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें