लापरवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त! नाबालिग को रिहा करने का आदेश
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Allahabad Highcourt News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चोरी के एक मामले में नाबालिग लड़के को जेल भेजे जाने पर सख्त नाराजगी जताई है. कोर्ट ने लड़के की हिरासत को पहली नजर में पूरी तरह ‘गैर-कानूनी’ मानते हुए उसे तुरंत रिहा करने का हुक्म दिया है. इस मामले में ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट और पुलिस की बड़ी लापरवाही सामने आई है, जहां बिना उम्र की जांच किए और सुप्रीम कोर्ट के नियमों को ताक पर रखकर नाबालिग को तीन बार रिमांड पर जेल भेज दिया गया. हाई कोर्ट ने इसे मजिस्ट्रेट की यांत्रिक कार्रवाई बताते हुए उनसे व्यक्तिगत हलफनामा और जवाब तलब किया है.
लापरवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, नाबालिग को रिहा करने का आदेश
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए देश में नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन को लेकर बेहद तल्ख टिप्पणी की है. कोर्ट ने चोरी के आरोप में जेल में बंद एक नाबालिग लड़के को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है. जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की बेंच ने नाबालिग को जेल भेजने की कार्रवाई को पहली नजर में पूरी तरह गैर-कानूनी करार दिया है. हाई कोर्ट ने इस मामले में संबंधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के कामकाज के तरीके पर गंभीर सवाल उठाते हुए उनसे व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है और पूछा है कि बिना उम्र की पुष्टि किए नाबालिग को जेल क्यों भेजा गया.
सुप्रीम कोर्ट के सतेंद्र अंतिल फैसले की उड़ी धज्जियां
अदालत ने मामले की फाइलों को देखते हुए पाया कि एफआईआर दर्ज होने के समय ही लड़के की उम्र 17 साल से कम थी, जिसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया. कोर्ट ने याद दिलाया कि जिन धाराओं (BNS की धारा 303 (3) और BNSS की धारा 317) के तहत मामला दर्ज था, उनमें अधिकतम 3 और 5 साल की सजा का प्रावधान है.
सुप्रीम कोर्ट ने ‘सतेंद्र अंतिल’ मामले में साफ गाइडलाइन दी है कि जिन अपराधों में 7 साल से कम की सजा है, वहां पुलिस को आरोपी को सीधे गिरफ्तार करने के बजाय सिर्फ जांच में शामिल होने का नोटिस (BNSS की धारा 35(3)) देना चाहिए. ऐसी धाराओं में गिरफ्तारी एक अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं. हाई कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अगर मजिस्ट्रेट ने सिर्फ लड़के की उम्र और कागजात को एक बार देख लिया होता, तो उसे जेल नहीं जाना पड़ता.
रिमांड ऑर्डर में अजीबोगरीब तारीख
इस पूरे मामले में लापरवाही यहीं खत्म नहीं हुई. हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, जब पुलिस ने 2 जून, 2026 को अदालत से आरोपी लड़के की रिमांड मांगी, तो मजिस्ट्रेट ने जो आदेश जारी किया उसमें 16 मई, 2026 तक के लिए 14 दिन की रिमांड मंजूर कर दी. यानी जून में दिए जा रहे आदेश में पुरानी तारीख (मई) तक की रिमांड लिख दी गई. हाई कोर्ट की बेंच ने इस तरह की भारी चूक को समझ से परे बताया.
छपे-छपाए फॉर्मेट पर दस्तखत
हाईकोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि ऐसा लगता है मजिस्ट्रेट ने रिमांड का आदेश जारी करते समय पूरी तरह से यांत्रिक दृष्टिकोण अपनाया. आदेश एक प्रिंटेड फॉर्मेट पर बिना सोचे-समझे पास कर दिया गया. ऐसा प्रतीत होता है कि मजिस्ट्रेट ने ऑर्डर-शीट को पढ़ा तक नहीं, जिसे उनके रीडर या पेशकार ने लिखकर सामने रख दिया था और उन्होंने सिर्फ दस्तखत कर दिए.
कोर्ट की पुलिस और प्रशासन को सख्त चेतावनी
इन तमाम गंभीर कमियों और मानवाधिकारों के उल्लंघन को देखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रजिस्ट्री को तुरंत आदेश दिया कि वह जेल प्रशासन को फैक्स या रेडियोग्राम के जरिए सूचित करे ताकि लड़के को बिना किसी देरी के तुरंत रिहा किया जा सके.
बेंच ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि एक नाबालिग बच्चे को एक बार नहीं, बल्कि तीन बार रिमांड आदेशों के जरिए जेल में रखा गया. कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होने का समन जारी किया है. हाई कोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि पुलिस और रिमांड मजिस्ट्रेट का लिखित स्पष्टीकरण संतोषजनक नहीं पाया गया, तो कोर्ट कानून का उल्लंघन करने वाले इन अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई के आदेश पारित करेगी. इस मामले की अगली सुनवाई 3 जुलाई को होगी.
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सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें