वृंदावन में यहां पर मिलती है राम रोटी, संत बनाते हैं सात्विक भोजन, तृप्त हो जाएगी आत्मा
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Ram Roti in Vrindavan : मथुरा-काशी, बनारस-अयोध्या किसी भी धार्मिक स्थल पर संतों के हाथ से चूल्हे पर बनी प्रसादी खाने को मिल जाए तो फिर क्या कहने. आत्मा तृप्त हो जाती है. यूपी के एक जिले में तो संत अपने हाथ से बनी चमत्कारिक राम रोटी खिलाते हैं. वो खुद ही सात्विक भोजन तैयार करते हैं. जमीन पर बैठाकर पत्तल में खिलाते हैं. हर दिन करीब 500 साधु-संतों, श्रद्धालुओं और गरीबों को भोजन कराते हैं. पिछले 25 साल से मानव सेवा कर रहे हैं. कैसे तैयार होता है 500 लोगों का भोजन, पैसे कौन देता है, संत का नाम क्या है, आइये जानते हैं…………
किसी गरीब को खाना खिलाना सबसे बड़ा पुण्य होता है. यह परमार्थ का काम होता है. भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा में हर साल करोड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. मथुरा में गोवर्धन की परिक्रमा करने का अगर आपका प्लान हो तो गिरिराज जी के मंदिर से चंद कदम दूर सड़क किनारे फुटपाथ पर रोटी वाले बाबा की कुटिया जाना ना भूलें. यहां पर एक साधु मिलेंगे. नाम है रोटी वाले बाबा. इनका असल नाम बनवारी दास (बाबा रामदास) है. आर्मी से रिटायर्ड हैं. ये सिर्फ साधु नहीं हैं भगवान श्रीकृष्ण के सुदामा हैं जो हर 500 से ज्यादा गरीबों को भोजन कराते हैं. बनवारी दास प्रयागराज के रहने वाले हैं. गिरिराज संत सेवा आश्रम के महंत राधा मोहन दास रघुनाथ सिद्ध के सानिध्य में भी रहे.
बाबा रामदास की कुटिया गोवर्धन परिक्रमा मार्ग कार्ष्णि आश्रम के पास है. नीम के पेड़ के नीचे 500 जरूरतमंदों को भोजन मिलता है. भोजनालय में पूरा भोजन लकड़ी के चूल्हे में बनता है. रोजाना 100 किलो आटे की रोटी, 100 किलो सब्जी, 20 किलो दाल और 25 किलो चावल इस रसोई में पकता है. दानवीर खुले हाथ से सामान भेजना शुरू कर देते हैं. सब्जी काटना, आटा गूंथना, रोटियां बेलना, सेंकना और घी लगाना सब काम सेवाभावी लोग करते हैं. भोजन से पहले हरिनाम संकीर्तन होता है. दोना-पत्तल में भरपेट भोजन मिलता है.
रोटी वाले बाबा ने एक पुराने इंटरव्यू में अपने जीवन के राज खोले थे. ठाकुर जी की प्रेरणा से सिर्फ 500 रुपये लेकर मथुरा-वृंदावन आए थे. वो बताते हैं, ‘पैसे कोई चोर ना ले जाए, इसलिए मैंने भोजन बनाकर कुछ लोगों को खिलाने की सोची. भोजन खिलाते-खिलाते पैसे खत्म हो गए. फिर लोगों का सहयोग मिलना शुरू हुआ. 10-20 लोगों से शुरू किया और आज 500 लोगों का भोजन कुटिया में बनता है. तब से लेकर आज तक लोगों का सहयोग जारी है. कोई भी दिन ऐसा नहीं गया कि लोगों को भोजन ना मिला हो. सब लोग जानते हैं कि अगर दिनभर भोजन ना मिले तो यहां तो मिल ही जाएगा.’
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रोटी वाले बाबा बताते हैं, ‘मुझे वैराग्य हो गया. मथुरा में गुरु के आश्रम में भी यही सेवा होती है. बस वहीं से प्रेरणा मिली. ठाकुर जी की कृपा से रोज शाम को भोजन जरूर बंटता है. सुबह भोजन बनाने की शुरुआत अकेले करते हैं. फिर लोगों का सहयोग मिलता जाता है. आटा-दाल, मसाले-सब्जियां कहां से आता है, इसकी जानकारी नहीं. गोवर्धन परिक्रमा मार्ग होने की वजह से बाहर से आने वाले श्रद्धालु मदद करते हैं. पूर्णिमा-अमावस्या को 1000 लोगों का भोजन बनता है.’
भोजन बहुत ही सात्विक तरीके से वैदिक विधि से तैयार होता है. बाबा रामदास भोजन बनाना शुरू करते हैं. पूजा करते हैं. जब भोजन बनकर तैयार हो जाता है तो ठाकुर जी का भोग लगाया जाता है. अग्नि देवता की पूजा की जाती है. इसके बाद कुटिया के पास फुटपाथ पर पंक्ति में बैठे गरीबों को पत्तल में भरपेट भोजन कराया जाता है. रोटी वाले बाबा पिछले 25 साल से खाना खिलाकर गरीबों का दिल जीत रहे हैं. अपना सबकुछ दांव पर लगाकर रोज जिंदगी की जंग जीत जाते हैं. पेड़ के नीचे बोरो की एक कुटिया बनाई हुई है. एक तख्त रखा है, जिस पर जीवनयापन करते हैं और संतों-गरीबों की भूख मिटाते हैं.
भोजन तैयार होते-होते यहां पर लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है. भोजन सुबह 5 बजे से लेकर रात 10 बजे तक मिलता है. रोटी वाले बाबा आर्मी में रहे हैं, ऐसे में अनुशासन उनके जीवन का हिस्सा है. उनकी वजह से प्रशासन को कोई दिक्कत नहीं होती. बाबा को ना कुछ पाने की इच्छा है, ना ही मन में द्वेष है. जो कुछ भी उनके पास है, उससे लोगों का पेट भरते हैं. उनकी जिंदगी का एक ही मकसद है : लोगों का पेट भरना.
बाबा का कहना है कि गिरिराज जी कृपा से भंडारा चल रहा है. गिरिराज जी किसी ना किसी स्वरूप में आकर मदद करते हैं. रोटी-दाल, चावल, पूड़ी-सब्जी, मिष्ठान, खीर सबकुछ कुटिया में बनता है. रात-दिन सेवा में लगे रहते हैं. सुबह 10 बजे दाल-चावल बनना प्रारंभ हो जाते हैं. शाम को 7 बजे से पंगत शुरू होती है. 21 किलोमीटर का परिक्रमा मार्ग है. जो भी साधु संत परिक्रमा मार्ग में रहते हैं, वो बड़े आदर भाव से प्रसाद ग्रहण करते हैं. साधु-संतों को रोटी वाले बाबा दक्षिणा भी देते हैं.