सुल्तानपुर का वो आंदोलन, जिसने हिला दी थी ब्रिटिश हुकूमत की नींव
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Sultanpur Freedom Struggle History: ब्रिटिश हुकूमत के जुल्म और सितम की दास्तानें तो आपने बहुत सुनी होंगी, लेकिन उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में आजादी की एक ऐसी अनसुनी चिंगारी सुलगी थी जिसने फिरंगियों की नींद उड़ा दी थी. साल 1922 में बाबू गणपत सहाय की रिहाई पर सुल्तानपुर रेलवे स्टेशन पर उमड़ा हजारों का सैलाब और गौरीगंज में किसानों पर हुआ बर्बर लाठीचार्ज वो मोड़ था, जिसने यहां स्वाधीनता आंदोलन को एक नई धार दे दी. क्रांतिकारियों के इसी अदम्य साहस का शोर सुनकर खुद पंडित मोतीलाल नेहरू और सरोजिनी नायडू जैसी महान शख्सियतें सुल्तानपुर की धरती पर खिंची चली आईं. आइए जानते हैं इतिहास के पन्नों में दफन सुल्तानपुर के इस गौरवशाली और उग्र आंदोलन की पूरी कहानी.
सुल्तानपुर: ब्रिटिश हुकूमत की यातनाओं का दंश देश के कोने-कोने के लोगों ने झेला, उसी में उत्तर प्रदेश का सुल्तानपुर जिला भी एक है. जहां पर ब्रिटिश अधिकारियों ने कई ऐसे अमानवीय कृत्य किए, जिससे यहां के आंदोलनकारी स्वतंत्रता सेनानियों ने एकजुट होने का प्रयास किया और देश की आजादी की लड़ाई में अहम योगदान दिया. एक ऐसी ही ऐतिहासिक घटना सुल्तानपुर में हुई, जिसके बाद पंडित मोतीलाल नेहरू खुद सुलतानपुर पहुंचे थे. इससे पहले जब बाबू गणपत सहाय जेल से छूटे, तो उनके स्वागत में सुल्तानपुर रेलवे स्टेशन पर 500 से अधिक लोगों की भारी भीड़ जुट गई थी. देखते ही देखते स्टेशन के बाहर 2000 से अधिक लोग इकट्ठा हो गए. इस बड़ी घटना ने सुल्तानपुर में आजादी की लड़ाई को और भी ज्यादा मजबूत किया. आइए विस्तार से जानते हैं कि आखिर कौन सी थी यह घटना.
17 फरवरी 1922: गौरीगंज की वो सभा और फिरंगियों का बर्बर लाठीचार्ज
वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह ‘लोकल 18’ से बात करते हुए बताते हैं कि 17 फरवरी सन् 1922 ई. को सुल्तानपुर के गौरीगंज (जो कि अब अमेठी का हिस्सा है) में स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने एक विशाल जनसभा आयोजित की थी. उस जनसभा में सुल्तानपुर और प्रतापगढ़ के हजारों लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था. इसी बीच दमनकारी ब्रिटिश पुलिस ने वहां मौजूद नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, जिसका परिणाम यह रहा कि वहां मौजूद भीड़ अचानक उग्र हो गई. जब स्थानीय थानाध्यक्ष बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने में पूरी तरह असफल हो गया, तो टेलीग्राम (तार) मिलने के बाद भारी पुलिस बल के साथ डिप्टी कमिश्नर खुद घटनास्थल पर पहुंच गया. वहां पहुंचकर उसने निर्दयतापूर्वक लाठी से निहत्थे कार्यकर्ताओं पर निर्मम वार किया.
बाबा रामलाल के नेतृत्व में जाग उठा था किसान आंदोलन
इसी समयावधि में स्थानीय किसानों के अंदर जमींदारों और तालुकेदारों के घोर अत्याचारों के विरुद्ध भी एक नई जागृति आ रही थी. इसके बाद किसान जगह-जगह पर संगठित और एकत्रित होने लगे थे. यह ठीक वही समय था जब बाबा रामलाल किसानों के अपने सबसे चहेते और बड़े नेता बन चुके थे. सन् 1922 ई. में बाबू गणपत सहाय के जेल से सकुशल छूटने के बाद करीब 500 कांग्रेसियों ने सुल्तानपुर रेलवे स्टेशन पर जोरदार प्रदर्शन किया, जो आगे चलकर मार्ग में बढ़ते हुए 2000 की बड़ी संख्या में पहुंच गया था.
सुल्तानपुर पहुंचे मोतीलाल नेहरू, सरोजिनी नायडू और पुरुषोत्तम दास टंडन
कांग्रेसियों के इसी अद्भुत उत्साह और राष्ट्रप्रेम का समाचार जब पंडित मोतीलाल नेहरू को मिला, तो वो भी खुद को रोक नहीं पाए और साल 1923 में सुल्तानपुर आ गए. यहां आकर उन्होंने स्थानीय कांग्रेसियों व क्रांतिकारियों से मुलाकात की. इसके बाद अप्रैल 1924 में पुरुषोत्तम दास टंडन और साल 1926 में श्रीमती सरोजिनी नायडू ने भी सुल्तानपुर जिले का विस्तृत दौरा किया था. वास्तव में असहयोग आंदोलन, किसान आंदोलन और अंग्रेजों की अत्यंत दमनकारी नीतियों ने ही आम लोगों को रेलवे स्टेशन पर इतनी बड़ी संख्या में इकट्ठा होने को मजबूर किया था.
साइमन कमीशन का विरोध और युवा वर्ग का अभूतपूर्व बलिदान
इसके बाद जब साइमन कमीशन मुम्बई पहुंचा, तो उसका कड़ा विरोध प्रकट करने के लिए यहां के स्थानीय कांग्रेसियों ने भी पूर्ण बंद का आह्वान किया और सड़कों पर उतरकर भारी प्रदर्शन किया. देश में हुए ऐतिहासिक काकोरी काण्ड, लाहौर षड्यंत्र केस और कानपुर षड्यंत्र केस ने भी यहां के उत्साही नवयुवकों को अंग्रेजों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करने की महान प्रेरणा दी थी. स्थिति यह थी कि सुल्तानपुर के विद्यार्थी वर्ग के युवकों ने अपनी नौकरियां तक छोड़ दीं और देश के लिए कांग्रेस के अभियानों में तन-मन-धन से पूरी तरह जुट गए.
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राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें