1883 में रखी गई थी नींव, अब बना एशिया का बौद्धिक धरोहर स्थल, शिब्ली अकादमी की कहानी अपने आप में इतिहास
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UP News: इस लाइब्रेरी की खासियत है कि इसमें आज तकरीबन डेढ़ लाख से अधिक कई भाषाओं में लिखित किताबें मौजूद हैं. इसके अलावा इस लाइब्रेरी में आज भी फारसी, अरबी और उर्दू भाषा में हाथों से लिखी हुई तकरीबन 700 से अधिक…और पढ़ें
700 से अधिक पांडुलिपियां
इस लाइब्रेरी की खासियत है कि इसमें आज तकरीबन डेढ़ लाख से अधिक कई भाषाओं में लिखित किताबें मौजूद हैं, इसके अलावा इस लाइब्रेरी में आज भी फारसी, अरबी और उर्दू भाषा में हाथों से लिखी हुई तकरीबन 700 से अधिक पांडुलिपियां मौजूद हैं. सन् 1883 में अल्लामा शिब्ली नोमानी के द्वारा इस शिब्ली अकादमी की नींव रखी गई थी, तब से लेकर आज तक शिब्ली एकेडमी शिक्षा के क्षेत्र में अपना परचम बुलंद किए हुए हैं.
लेखकों का घर
उनके इस सपने को पूरा करते हुए उसी दिन उनके शिष्यों के द्वारा दारुल मुसन्निफीन (लेखकों का घर) संस्था के तहत इस ऐतिहासिक कुतुबखाना की स्थापना की गई. शिब्ली अकादमी में मौजूद यह कुतुबखाना आज भी सिर्फ आजमगढ़ ही नहीं बल्कि देश विदेश के कई उर्दू ,फारसी और अरबी रिसचर्स के लिए बेहद महत्वपूर्ण केंद्र में से एक है. इस लाइब्रेरी में 700 हस्तलिखित पांडुलिपियां के साथ साथ कई बेश कीमती ऐतिहासिक किताबें भी मौजूद हैं. इनमें शाहजहां की बेटी बेगम जहांआरा की ‘मुनिस–उल–अरवाह’ और ‘सिर्रे अकबर’, साथ ही हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध उपनिषदों और महाभारत का फारसी अनुवाद भी उपलब्ध है. 15 एकड़ में फैले इस कॉलेज में उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी और हिन्दी में लिखी गई 1.5 लाख से अधिक पुस्तकें संग्रहीत हैं.