’50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण मान्य नहीं’, चार मेडिकल कॉलेजों वाले केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
अंबेडकरनगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर के मेडिकल कॉलेजों में एससी-एसटी वर्ग को आरक्षण सीमा से ज्यादा सीटें दी गईं. यह प्रावधान 2010 से 2015 के बीच जारी शासनादेशों के जरिए लागू किया गया, जिनके कारण आरक्षित वर्ग के लिए 79 फीसदी तक सीटें सुरक्षित हो गईं.
डबल बेंच की टिप्पणी
राज्य सरकार ने सिंगल बेंच के आदेश के खिलाफ विशेष अपील दाखिल की. इस पर सुनवाई करते हुए डबल बेंच ने कहा कि 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन नहीं हो सकता. जिन छात्रों को सीमा से बाहर जाकर दाखिले दिए गए, उन्हें फिलहाल हटाया नहीं जाएगा. एससी-एसटी छात्रों को अन्य मेडिकल कॉलेजों की 82 रिक्त सीटों पर समायोजित किया जाएगा. सरकार एक सप्ताह के भीतर शपथपत्र दाखिल कर आश्वस्त करे कि अगले शैक्षणिक सत्र से सीमा का पालन होगा.
डबल बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अगर सरकार ने तय समय पर शपथपत्र दाखिल नहीं किया, तो अदालत का यह अंतरिम आदेश स्वतः समाप्त हो जाएगा. इसका मतलब है कि तब सिंगल बेंच का आदेश लागू हो जाएगा और काउंसलिंग की प्रक्रिया नए सिरे से करानी पड़ेगी.
छात्रों के लिए राहत
एससी-एसटी वर्ग के छात्रों के सामने दाखिले रद्द होने का खतरा मंडरा रहा था. अदालत ने उनके हितों को ध्यान में रखते हुए राहत दी और उन्हें अन्य कॉलेजों की खाली सीटों पर समायोजित करने का निर्देश दिया. इस फैसले से लगभग 82 छात्रों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा.
इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 25 अगस्त को बड़ा फैसला सुनाते हुए आरक्षण सीमा से जुड़े छह शासनादेशों को रद्द कर दिया. अदालत ने 20 जनवरी 2010, 21 फरवरी 2011, 13 जुलाई 2011, 19 जुलाई 2012, 17 जुलाई 2013 और 13 जून 2015 को जारी आदेशों को असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया.
क्यों है यह फैसला अहम?
भारतीय संविधान और सुप्रीम कोर्ट दोनों ही 50 फीसदी से अधिक आरक्षण की इजाजत नहीं देते. इसके बावजूद यूपी सरकार ने लंबे समय तक शासनादेशों के जरिए नियमों को दरकिनार किया. इस मामले ने न सिर्फ आरक्षण व्यवस्था की खामियों को उजागर किया, बल्कि छात्रों के भविष्य को भी प्रभावित किया.
राज्य सरकार पर टिकी सबकी निगाहें
अब सबकी निगाहें राज्य सरकार पर टिकी हैं. अगर सरकार ने शपथपत्र दाखिल कर दिया, तो छात्रों के दाखिले सुरक्षित रहेंगे और भविष्य में आरक्षण सीमा का उल्लंघन नहीं होगा. अगर सरकार ऐसा करने में विफल रही, तो सिंगल बेंच का आदेश लागू होकर पूरा परिदृश्य बदल सकता है.