फर्रुखाबाद में गंगा का कहर.. मदरसा, मकान और गांव की जमीन निगली धार, ग्रामीणों में दहशत

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फर्रुखाबाद में गंगा का कहर.. मदरसा, मकान और गांव की जमीन निगली धार, ग्रामीणों में दहशत


फर्रुखाबाद (सदर): गंगा नदी का कटान अब पंखियन की मड़ैया गांव के लिए विनाश का कारण बनता जा रहा है. हालात इतने भयावह हो चुके है कि महज आधे घंटे में सातवीं तक के बच्चों का मौलाना द्वारा संचालित मदरसा और दो पक्के मकान गंगा में समा गए. ग्रामीणों का कहना है कि गंगा की धार गांव से कभी 5 किलोमीटर दूर बहती थी, लेकिन अब वह गांव की देहरी पर पहुंच चुकी है.

पिछले दिनों गंगा की कटान ने रफ्तार ऐसी पकड़ी कि आधा घंटे में पांच मीटर जमीन नदी में समा गई. सुबह 10 से साढ़े 10 बजे के बीच, मदरसा जामिया बास्तिया देखते-देखते गंगा में विलीन हो गया. यही नहीं, गांव के जाकिर का मुख्यमंत्री आवास भी अब गंगा की धार में लटक रहा है, जो कभी भी गिर सकता है.

सड़क और ट्रांसफार्मर पर भी खतरा
गांव की मुख्य सड़क से गंगा अब महज तीन मीटर दूर रह गई है. यदि यह सड़क भी कट गई, तो करीब 40 मकानों के लोगों का आवागमन पूरी तरह से ठप हो जाएग. वहीं, ट्रांसफार्मर भी गंगा से कुछ कदम की दूरी पर है, जिसे गिरने का खतरा लगातार बना हुआ है.

अब तक 60 मकान और कब्रिस्तान हो चुके हैं जमींदोज
ग्रामीणों ने बताया कि पिछले दो वर्षों में 55 से 60 मकान और एक कब्रिस्तान गंगा की कटान में समा चुका है. इस बार दो पक्के मकान और एक झोपड़ी का नामोनिशान मिट गया, जबकि 10 मकान अभी भी खतरे में है. पूरी उपजाऊ खेती पहले ही गंगा लील चुकी है.

2014 में बहती थी 5 किमी दूर, अब गांव की देहरी पर
ग्राम प्रधान शहनाज़ के पति शाहिद अली ने बताया कि वर्ष 2014 में गंगा की धारा लायकपुर सबलपुर के पास बहती थी, जो गांव से करीब 5 किलोमीटर दूर थी. लेकिन अब 11 वर्षों में गंगा ने धीरे-धीरे गांव को निगल लिया. अब गांव की सारी जमीन कट चुकी है, सिर्फ कुछ घर ही बाकी है.

मदरसा संचालक की पीड़ा: 10 लाख का नुकसान
मौलाना शहरोज़ आलम, जो कि मदरसा जामिया बास्तिया के संचालक है. उन्होंने बताया कि 2014 से यह मदरसा चल रहा था. लेकिन इस बार की कटान इतनी तेज थी कि कुछ भी निकालने तक का समय नहीं मिला. देखते ही देखते मदरसा और उनका चार कमरों वाला पक्का मकान भी नदी में समा गया. मौलाना ने लगभग 10 लाख रुपये के नुकसान का अनुमान जताया है.

ठोकरें और परकोपाइन भी बेअसर
मौलाना शहरोज़ ने बताया कि कटान रोकने के लिए दो बार परकोपाइन डाले गए लेकिन वे भी गंगा में बह गए. तीन-चार बार ठोकरें बनाई गईं, वे भी नदी में समा गईं. प्रशासन की ओर से न तो स्थायी समाधान हुआ, न समय रहते कार्रवाई. उन्होंने कहा कि अगर पत्थर या कैप्सूल पद्धति से स्थायी समाधान नहीं किया गया तो पूरा गांव खत्म हो जाएगा.

प्रशासन पर गंभीर आरोप
गांव के लोगों ने आरोप लगाया कि जिलाधिकारी और जल निगम अधिकारियों के निरीक्षण के बाद भी कोई काम शुरू नहीं हुआ. सिर्फ आश्वासन मिलते रहे। करीब 2800 की आबादी वाले इस गांव में लोग जान जोखिम में डालकर रह रहे है. गांव की पूरी जमीन खत्म हो चुकी है, अब सिर्फ बचे हुए घरों की सुरक्षा बाकी है.

ग्रामीणों की मांग: सिर्फ सर्वे नहीं..
ग्रामीणों ने मांग की है कि सिर्फ निरीक्षण और गाथा-पत्र लेने से कुछ नहीं होगा। यदि समय रहते कटान रोकने के लिए पत्थर या पक्का बांध निर्माण नहीं हुआ, तो गांव वीरान होने से कोई नहीं रोक सकेगा. मौलाना और ग्राम प्रधान पति दोनों ने कहा कि जल निगम, सिंचाई विभाग और प्रशासन की लापरवाही ने आज गांव को इस स्थिति में पहुंचा दिया है.



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