यूपी के बांदा में ही क्यों सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती है? क्यों ये साल नर्क जैसा

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यूपी के बांदा में ही क्यों सबसे ज्यादा गर्मी पड़ती है? क्यों ये साल नर्क जैसा


स्थानीय प्रशासन ने दोपहर 12 से शाम 4 बजे तक लोगों को घरों में रहने की एडवाइजरी जारी की है. मनरेगा जैसी मजदूरी के काम सुबह जल्दी निपटाने को कहा गया है. अस्पतालों में हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और बुखार के मरीजों की कतारें हैं.

बांदा हमेशा से ऐसा था या कुछ बदला है?
पर्यावरण के जानकारों का कहना है कि अपनी बनावट और लोकेशन की वजह से बांदा में हमेशा से ही कड़क गर्मी पड़ती आई है. लेकिन अब वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सिर्फ मौसम का फेरबदल नहीं है, बल्कि इंसानों की गलतियों के कारण बांदा धीरे-धीरे ‘गर्मी का एक ऐसा टापू’ बनता जा रहा है जो खुद आग उगल रहा है. पहले यहां बर्दाश्त से बाहर वाली गर्मी सिर्फ मई के आखिरी दिनों और जून की शुरुआत में पड़ती थी. लेकिन अब तो मार्च के महीने से ही गर्म हवाएं (लू) झुलसाने लगती हैं और यह सिलसिला जुलाई के पहले हफ्ते तक चलता रहता है. सबसे बड़ी आफत यह है कि अब यहां रातें भी ठंडी नहीं होतीं. रात का कम से कम तापमान भी 32 से 35 डिग्री बना रहता है, जिसका मतलब है कि लोगों को चौबीसों घंटे गर्मी से पल भर की राहत नहीं मिलती.

बांदा के ‘भट्टी’ बनने के असली कारण

1. थार और सिंध से आती लू की हवाएं
राजस्थान और सिंध के रेगिस्तानों से आने वाली सूखी और जलती हुई पश्चिमी हवाएं इस इलाके पर गर्म ड्रायर की तरह चलती हैं. इन्हें ‘लू’ कहते हैं. IMD के लखनऊ केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक मोहम्मद डेनिश ने बताया कि बुंदेलखंड की स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि जिन पश्चिमी विक्षोभों ने इस महीने उत्तर भारत के दूसरे हिस्सों को थोड़ी ठंडक दी, वे इस इलाके तक नहीं पहुंच पाए. ऊपर से 20-40 किमी प्रति घंटे की तेज सूखी हवाएं चल रही हैं और असामान्य रूप से गर्म रातें किसी भी तरह की ठंडक को रोक रही हैं.

2. ग्रेनाइट और चट्टानी जमीन
बांदा एक ऐसे पथरीले और कम हरियाली वाले ऊंचे इलाके पर बसा है, जहां जमीन के नीचे कठोर ग्रेनाइट पत्थर की चट्टानें हैं. यह पथरीली जमीन दिनभर सूरज की तेज गर्मी और लपटों को अपने अंदर सोख लेती है और फिर रात के समय उसी गर्मी को वापस हवा में उगलने लगती है, जिससे रात में भी यहां ठंडक नहीं हो पाती. मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोब पर बांदा की लोकेशन ऐसी जगह है, जहां गर्मियों में सूरज ठीक सिर के ऊपर होता है और उसकी किरणें बिल्कुल सीधी पड़ती हैं. साफ आसमान, पथरीली धरती, ग्रेनाइट की चट्टानें और मिट्टी में पानी की भारी कमी, ये सब चीजें मिलकर दिन में तो यहां आग बरसाती ही हैं, रात को भी भट्टी की तरह तपाए रखती हैं.

3. घटता जल स्तर और जंगल
पूरे बुंदेलखंड में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और जमीन के नीचे का पानी खत्म होने की वजह से अब मिट्टी में जरा भी गीलापन या नमी नहीं बची है. जब मिट्टी सूखी होती है, तो पानी भाप बनकर हवा को जो प्राकृतिक ठंडक देता था, वह पूरी तरह खत्म हो जाती है. एक पर्यावरण विशेषज्ञ का कहना है कि बुंदेलखंड की पथरीली जमीन तो गर्मी बढ़ाती ही है, लेकिन केन और बाघैन जैसी नदियों में पानी सूखने और हरियाली खत्म होने ने आग में घी का काम किया है. बांदा की जीवनरेखा कही जाने वाली केन नदी से जिस तरह अंधाधुंध बालू निकाली जा रही है और पेड़-पौधे सिमट रहे हैं, उसने प्रकृति के उस कूलिंग सिस्टम को ही तोड़ दिया है जो पहले यहां के तापमान को काबू में रखता था.

इतनी गर्मी से क्या-क्या नुकसान हो रहा है?

खेती पर असर
बांदा के लोगों का पूरा जीवन और कमाई खेती-किसानी पर टिकी है. लेकिन इस जानलेवा गर्मी के कारण रबी की फसलों (जैसे गेहूं, चना) के दाने पकने से पहले ही खेतों में सूख कर छोटे रह जाते हैं, जिससे पैदावार लगातार घट रही है. इसके अलावा, गर्मी के मौसम में होने वाली सब्जियां और जायद की फसलें, जैसे तरबूज और खरबूजा, खेतों में बेल पर ही झुलसकर बर्बाद हो जा रही हैं.

इंसानों पर असर
स्थानीय लोगों का कहना है कि वे अब सुबह 10 बजे से पहले ही अपने दिनभर के सारे जरूरी काम निपटा लेते हैं. दोपहर के वक्त खेतों में या किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी करना नामुमकिन सा हो गया है. इस असहनीय गर्मी और काम ठप होने के कारण बांदा और उसके आसपास के गांवों से नौजवान लड़के दिल्ली, मुंबई और सूरत जैसे बड़े शहरों की तरफ भाग रहे हैं. भयंकर लू की चपेट में आने से हर साल कई बुजुर्गों और मासूम बच्चों की जान चली जाती है, जिनकी मौतें अक्सर सरकारी कागजों और आंकड़ों तक पहुंच ही नहीं पातीं.

जानवरों का हाल
बांदा में खुले घूमने वाले आवारा मवेशियों की एक बहुत बड़ी समस्या है. इस तपती धूप में इन बेजुबान जानवरों को न तो कहीं चरने के लिए घास मिलती है और न ही पीने का पानी. नतीजा यह होता है कि हर साल मई और जून के महीने में सैकड़ों गाय-बैल लू और प्यास के कारण तड़प-तड़प कर दम तोड़ देते हैं. सिर्फ पालतू या आवारा ही नहीं, बल्कि जंगलों में पानी के छोटे-मोटे गड्ढे और सोते सूख जाने से जंगली जानवर और पक्षी भी भारी तादाद में मर रहे हैं.

बूंद-बूंद को तरसता बांदा
बांदा में जमीन के नीचे का पानी लगातार सूखने की वजह से पूरी धरती बंजर जैसी हो रही है. गर्मी का मौसम शुरू होते ही गांव के तालाब, कुएं और पुराने पोखर पूरी तरह सूख जाते हैं. हैंडपंप सिर्फ दिखावे की चीज बनकर रह जाते हैं क्योंकि पानी का स्तर खिसक कर 150 से 200 फीट नीचे पाताल में चला जाता है. ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं को पीने का पानी लाने के लिए चिलचिलाती धूप में दो से तीन किलोमीटर तक पैदल भटकना पड़ता है. कई गांवों की जिंदगी पूरी तरह से सरकारी या प्राइवेट पानी के टैंकरों के भरोसे चल रही है. यहां तक कि बांदा की शान कही जाने वाली केन नदी भी गर्मियों में सूखकर कई जगहों पर एक पतली सी लकीर जैसी दिखने लगती है.

‘हीट पॉवर्टी’
एक ऐसी बात है जिस पर लोग अक्सर ध्यान नहीं देते, और वह है गर्मी से पैदा होने वाली गरीबी यानी ‘हीट पॉवर्टी’. अमीर और पैसे वाले लोग तो घरों में एसी और बड़े-बड़े कूलर चलाकर इस गर्मी से बच सकते हैं, लेकिन बांदा की एक बहुत बड़ी आबादी रोज कमाकर खाने वाले दिहाड़ी मजदूरों, रिक्शा चालकों और ठेला लगाने वालों की है. 48 डिग्री तापमान का सीधा मतलब है कि दोपहर में बाजार और सड़कें बंद, यानी उनका काम पूरी तरह ठप और रोज़ की कमाई आधी. ऊपर से झुलसाने वाली गर्मी में कूलर चलाने के लिए बिजली का भारी-भरकम बिल और बीमारी के इलाज का खर्च यहां के गरीब परिवारों को कर्ज के दलदल में धकेल देता है.

बांदा की यह कड़क गर्मी सिर्फ एक मौसम का मिजाज नहीं है. यह पिछले कई सालों से प्रकृति के साथ की गई छेड़छाड़, मौसम में आ रहे बदलाव और सरकारी तंत्र की लापरवाही का कड़वा नतीजा है. जब तक केन नदी से अवैध बालू का खनन नहीं रुकेगा, बड़े पैमाने पर पेड़ लगाकर हरियाली नहीं बढ़ाई जाएगी और जमीन के नीचे का पानी नहीं बचाया जाएगा, तब तक बांदा की यह ‘भट्टी’ हर साल इसी तरह और तेज धधकती जाएगी.



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