अयोध्या में एक ऐसा मंदिर जहां भगवान को सुनाई जाती है गालियां, फिर लगता है भोग

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अयोध्या में एक ऐसा मंदिर जहां भगवान को सुनाई जाती है गालियां, फिर लगता है भोग


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Ayodhya Latest News: आपको सुनकर थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन यह सच है भगवान राम की नगरी अयोध्या के एक मंदिर में पहले भगवान को गाली सुनाई जाती है, उसके बाद उन्हें भोग लगाया जाता है. आइए जानते हैं इसके पीछे की मान्यता.

अयोध्या: मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या अपने रहस्यों, परंपराओं और अनूठी साधना पद्धतियों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है. यहां हजारों मठ और मंदिर हैं, जहां अलग-अलग परंपराओं से भगवान श्रीराम और माता जानकी की आराधना की जाती है. इन्हीं परंपराओं में एक ऐसी अद्भुत परंपरा भी शामिल है, जिसे सुनकर हर कोई हैरान रह जाता है. अयोध्या के कुछ मंदिरों में भगवान को भोग लगाने से पहले उन्हें गाली सुनाई जाती है और उसके बाद ही प्रसाद अर्पित किया जाता है.

यह परंपरा विशेष रूप से रसिक संप्रदाय और मिथिला परंपरा से जुड़े मंदिरों में निभाई जाती है. यहां प्रभु श्रीराम को दूल्हा सरकार के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि जैसे प्राचीन भारतीय विवाह परंपराओं में दूल्हे को भोजन कराने से पहले हंसी-मजाक और गाली गीत गाए जाते थे. उसी भाव को भगवान की सेवा में भी शामिल किया गया है. अयोध्या के प्रसिद्ध कथा वाचक पवन दास शास्त्री बताते हैं कि यह केवल अयोध्या तक सीमित नहीं है, बल्कि जनकपुर चित्रकूट मथुरा वृंदावन में भी सखी भाव की साधना परंपरा देखने को मिलती है. इस परंपरा में पुजारी स्वयं को माता जानकी की सखी और सहेली मानकर प्रभु श्रीराम की सेवा करते हैं.

रसिक संप्रदाय के संतों के अनुसार यह गाली अपमान नहीं बल्कि प्रेम, अपनत्व और हास्य भाव का प्रतीक होती है. मान्यता है कि जब तक दूल्हा सरकार को प्रेमपूर्वक गाली गीत नहीं सुनाए जाते, तब तक उन्हें भोजन में रुचि नहीं आती. यही कारण है कि भोग लगाने से पहले विशेष लोक शैली में गाली गीत गाए जाते हैं. अयोध्या के कई प्राचीन मंदिरों और मठों में आज भी यह परंपरा जीवित है इनमें प्रमुख रूप से लक्ष्मण किला, जानकी घाट बड़ा स्थान ,रंग महल मंदिर जैसे स्थान शामिल हैं, जहां मिथिला और रसिक परंपरा के अनुसार भगवान की सेवा-पूजा की जाती है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह परंपरा त्रेता युग से चली आ रही है.मिथिला संस्कृति में विवाह के दौरान गाली गीतों का विशेष महत्व माना जाता है.इन्हें प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक समझा जाता है, न कि अपमान का यही कारण है कि भगवान श्रीराम और माता जानकी के दिव्य विवाह भाव को जीवंत रखने के लिए यह परंपरा आज भी निभाई जा रही है.



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