अखिलेश यादव सपा में किसे बनाएंगे नये ‘आजम खान’? क्या इस ‘कुंवारी’ सांसद में है वो स्पॉर्क
लखनऊ: 2019 के लोकसभा चुनाव तक समाजवादी पार्टी में अगर कोई सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा रहा तो यह तमगा निर्विवाद रूप से आजम खान के नाम सजता रहा. बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन के बाद भी लगातार दूसरी बार समाजवादी पार्टी के महज पांच सांसद जीते थे. सपा की दुर्गति के दौर में भी आजम खान रामपुर से चुनकर लोकसभा पहुंचे. संसद में आजम खान की दो चार तकरीर ही हुई कि उनका बुरा वक्त शुरू हो गया. जौहर यूनिवर्सिटी के नाम पर जमीन कब्जाने से लेकर बकरी चोरी जैसे मुकदमों में उलझने के बाद आजम खान लगातार जेल की सलाखों के पीछे ही समय काट रहे हैं. खुद तो जेल गए ही, बेटा भी सलाखों के पीछे पहुंच गया.
2019 में सांसद बनने के बाद से आजम के शुरू हुए बुरे दिन
आजम खान के खिलाफ दर्ज सौ से ज्यादा मुकदमों पर सुनवाई के दौरान कोर्ट तक को कहना पड़ा कि समाजवादी पार्टी के नेता को कानूनी पचड़ों में उलझाने का प्रयास किया गया है. जेल में लंबा समय काटने के बाद बेहद कमजोर हालत में आजम खान 20 मई 2022 को जेल से बाहर आए. कई मीडिया इंटरव्यू में अपने दुख दर्द को बयां ही कर रहे थे कि 18 अक्टूबर 2023 को रामपुर की एमपी-एमएलए (MP-MLA) कोर्ट ने बेटे अब्दुल्ला आजम के दो जन्म प्रमाण पत्र मामले में आजम खान दोबारा सीतापुर जेल भेज में जमा हो गए.
आजम खान के जेल जाने के बाद सपा में कोई भी सर्वमान्य मुस्लिम नेता नहीं
आजम खान के जेल जाने की सबसे ज्यादा कमी शायद समाजवादी पार्टी और उसके मुखिया अखिलेश यादव को खल रही होगी. उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खान लंबे समय तक मुसलमानों का सबसे बड़ा चेहरा बने रहे. सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की ओर से आगे बढ़ाए जाने के बाद आजम खान का रुतबा बतौर मुस्लिम नेता लगातार बढ़ता चला गया. आलम यह था कि सेक्युलर राजनीति करने वाले दूसरे दल भी आजम खान को अपने राज्यों में रैलियों के लिए बुलाते.
आजम खान के जेल जाने के बाद से समाजवादी पार्टी में कोई ऐसा मुस्लिम नेता नहीं है जिसकी पूरे उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यकों के बीच स्वीकार्यता हो. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव हो चाहे 2024 का लोकसभा चुनाव, दोनों मौकों पर अखिलेश यादव को खुद आगे आकर मुस्लिम वोटरों को आकर्षित करते दिखे. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पिता मुलायम सिंह यादव की तरह ही अखिलेश यादव भी अपनी पार्टी से किसी मुस्लिम नेता को आगे कर उसकी राज्य स्तर पर स्वीकार्यता बनाने का प्रयास कर सकते हैं.
सपा की इस महिला सांसद में आजम बनने की खूबी
इस सवाल के जवाब में लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार ने एक यूट्यूब चैनल से बातचीत में कहा आसिफ रजा जाफरी ने कहा कि केवल अखिलेश यादव किसी के ऊपर हाथ रख दें तो वह मुस्लिमों का नेता नहीं बन सकता है. इसके लिए उस नेता में भी काबलियत होनी चाहिए. मुलायम सिंह यादव के दौर को याद करते हुए उन्होंने बताया कि कई मुस्लिम नेताओं को उन्होंने मौके दिए, लेकिन कोई आजम खान नहीं बन पाया.
उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि मुलायम सिंह यादव ने अमरोहा में महबूब अली, शाहिद मंजूर, नवाब इकबाल महमूद, डॉक्टर वकार अहमद शाह, अहमद हसन, कमाल अख्तर, हाजी रियाज मजूर जैसे मुस्लिम नेताओं को आगे बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन कोई भी आजम खान की तरह राज्य या देश स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना पाया. अकेले आजम खान ही अपनी भाषण शैली और अपने क्षेत्र से बाहर जाकर अलग पहचान बना पाए.
उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में मुस्लिमों का चेहरा बनने के लिए नेता की स्वीकार्यता कुछ हिंदुओं के बीच भी होनी चाहिए. ये कला आजम खान में रही. आजम खान के ज्यादातर भाषण बैलेंस हुआ करते, उसमें सांप्रदायिकता फैलाने वाले शब्द कम ही मौको पर दिखा करते.
बिहार चुनाव में थी सपा की महिला नेता भारी डिमांड
यहां जानकारी के लिए बता दूं कि 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान इकरा हसन की भारी डिमांड देखी गई थी. इंडिया गठबंधन की तरफ से इकरा हसन बिहार के सिवान जिले में प्रचार करने पहुंची थीं. खासकर वह पूर्व बाहुबली शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब के लिए रघुनाथपुर विधानसभा सीट पर वोट मांगने पहुंची. इस रैली में उनके भाषण की धार का देखकर बिहार के दूसरे जिलों किशनगंज, दरभंगा, पूर्णिया, कटिहार जैसे जिलों में भी दिखी थी. बता दें कि लोकसभा की युवा सांसदों में एक इकरा हसन अभी कुंवारी हैं. उनके निकाह को लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर चर्चाएं उड़ती रहती है जिसका वह लगातार खंडन करती रही हैं.
यूपी की मौजूदा राजनीति में इकरा हसन जैसी नेताओं को आगे करना सपा की एक मजबूरी भी नजर आती है, क्योंकि बीजेपी तीन तलाक कानून को खत्म करके निराश्रित महिलाओं को प्रति महीने हजार रुपये देने जैसी योजनाओं के जरिए मुस्लिम महिलाओं को अपने साथ जोड़ने के प्रयास में जुटी है. ऐसे में इकरा जैसी मुस्लिम महिला नेता शायद बेहतर तरीके से अल्पसंख्यक समाज की महिलाओं के सामने पार्टी की बात को रख पाएंगी.