शादी से त्योहारों तक हाथों की रौनक बढ़ाने वाली रंग-बिरंगी चूड़ियां आखिर बनती कैसे हैं?

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शादी से त्योहारों तक हाथों की रौनक बढ़ाने वाली रंग-बिरंगी चूड़ियां आखिर बनती कैसे हैं?


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Glass Bangles Making Process: फिरोजाबाद की कांच की चूड़ियां सिर्फ एक आभूषण नहीं, बल्कि सदियों पुरानी कारीगरी का शानदार नमूना हैं. इन रंग-बिरंगी चूड़ियों को तैयार करने के लिए कांच को करीब 1200 डिग्री तापमान पर पिघलाया जाता है और कई कठिन प्रक्रियाओं से गुजारने के बाद इन्हें अंतिम रूप दिया जाता है. सैकड़ों कारीगर दिन-रात मेहनत करके इन चूड़ियों को आकार देते हैं, जिसके बाद जरी, नग और खूबसूरत डिजाइन से सजाकर इन्हें देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाया जाता है.

यूपी के फिरोजाबाद में बनने वाली कांच की चूड़ियां अपनी बेहतरीन कारीगरी और खूबसूरत डिजाइनों के लिए देश-विदेश में मशहूर हैं. इन चूड़ियों को बनाने की पूरी प्रक्रिया काफी मेहनत और बारीकी से पूरी की जाती है. सबसे पहले कांच को तेज तापमान पर पिघलाया जाता है और फिर कई अलग-अलग चरणों से गुजरने के बाद चूड़ियों को आकार दिया जाता है. इस काम में कारखानों में सैकड़ों कारीगर मिलकर काम करते हैं. आइए जानते हैं कि कांच की ये खूबसूरत चूड़ियां आखिर कैसे बनती हैं.

कांच की चूड़ियां बनाने के लिए सबसे पहले रॉ मटेरियल तैयार किया जाता है. इसमें कांच बनाने वाले जरूरी खनिज और अन्य सामग्री तय अनुपात में मिलाई जाती है. इसके बाद इस मिश्रण को करीब 1200 डिग्री सेल्सियस तापमान वाली भट्टी में डाला जाता है. तेज गर्मी में यह पूरी तरह पिघलकर तरल कांच बन जाता है. फिर इस पिघले हुए कांच को लोहे की रॉड पर लिया जाता है, ताकि आगे की प्रक्रिया शुरू की जा सके.

चूड़ी बनाने वाले कारखानों में कांच पिघलाने के लिए बड़ी-बड़ी भट्टियां लगी होती हैं. इन भट्टियों में चारों तरफ बने विशेष छेदों के जरिए कारीगर लोहे की रॉड अंदर डालते हैं और उस पर पिघला हुआ कांच लेते हैं. इसके बाद सावधानी से रॉड को बाहर निकालकर अगले चरण के लिए भेजा जाता है.

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कांच की चूड़ियां बनाने का काम हर मौसम में भट्टियों की तेज गर्मी के बीच किया जाता है. जिस रंग की चूड़ियां तैयार करनी होती हैं, उसी रंग का कांच पहले से तैयार किया जाता है. जब पिघला हुआ कांच लोहे की रॉड पर अच्छी तरह चिपक जाता है, तब कारीगर उसे अगले चरण में ले जाकर दोबारा गर्म करते हैं, ताकि उसे आसानी से मनचाहा आकार दिया जा सके.

इसके बाद कांच को एक दूसरी भट्टी में ले जाया जाता है. यहां कारीगर रॉड पर लगे पिघले हुए कांच को तेज गति से घूमने वाले बेलननुमा उपकरण पर चढ़ाते हैं. धीरे-धीरे कांच पतली और लंबी लकीर का रूप लेता है और गोल आकार में लिपटने लगता है. इसी प्रक्रिया के दौरान चूड़ियों का मूल आकार तैयार होता है.

जब बेलन पर पर्याप्त संख्या में चूड़ियां बन जाती हैं, तो कारीगर उन्हें सावधानी से दूसरी लोहे की रॉड की मदद से बाहर उतार लेते हैं. इस समय चूड़ियां बेहद गर्म होती हैं, इसलिए उन्हें हाथ से नहीं छुआ जाता. पूरा काम विशेष औजारों की मदद से किया जाता है, ताकि चूड़ियां टूटें नहीं और कारीगर सुरक्षित रहें.

कारखाने से निकलने के बाद चूड़ियों को ठंडा होने के लिए रखा जाता है. पूरी तरह ठंडी होने के बाद कारीगर उन्हें बेलन से अलग करते हैं और एक-एक चूड़ी को सावधानी से निकालते हैं. इस दौरान कुछ चूड़ियां टूट भी जाती हैं, लेकिन उत्पादन की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है और बड़ी संख्या में नई चूड़ियां तैयार होती रहती हैं.

जब चूड़ियां पूरी तरह तैयार हो जाती हैं, तो उन्हें साइज के अनुसार अलग-अलग करके तोड़ों (गुच्छों) में बांधा जाता है. इसके बाद कुछ चूड़ियां सीधे बाजार में भेज दी जाती हैं, जबकि कई चूड़ियों पर आगे जरी, जरकन, नग, फिगर और अन्य सजावटी डिजाइन का काम किया जाता है. सजावट पूरी होने के बाद इन्हें देश के अलग-अलग शहरों और विदेशों तक बिक्री के लिए भेजा जाता है.

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