राजा ने किया कैद, अंग्रेजों ने छुड़ाया…121 गांवों की ये रियासत कैसे बनी अमेठी की जान?
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Amethi Dharohar : अमेठी के इतिहास में शाहगढ़ रियासत का नाम सबसे अलग और चमकीला है. ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1902 में प्रकाशित सुल्तानपुर गजेटियर के पृष्ठ संख्या 97 पर शाहगढ़ के इतिहास का विस्तृत उल्लेख मिलता है. गजेटियर के अनुसार, शाहगढ़ रियासत की स्थापना अमेठी राजवंश के राजा बिक्रम शाह के भाई सुल्तान शाह ने की थी. यह अपने आप में रोचक इतिहास वाली रियासत रही है. अमेठी जिले की यह रियासत 121 गांव में फैली हुई थी, जो उस समय समृद्धि, शक्ति और प्रभाव का प्रतीक मानी जाती थी. सुल्तान शाह की ओर से स्थापित इस रियासत ने उत्थान, संघर्ष, सत्ता संघर्ष और सम्मान की रक्षा के अनेक अध्याय देखे.
अमेठी जिले में कई रियासतों का रोचक इतिहास रहा है. शाहगढ़ रियासत उनमें से एक है. इस रियासत की कहानी काफी दिलचस्प है. इस रियासत में बहुत सारी ऐतिहासिक धरोहरें आज भी मौजूद हैं. इन धरोहरों का इतिहास लोग जानने के लिए उत्सुक रहते हैं. शाहगढ़ अमेठी की सबसे पुरानी रियासतों में से एक मानी जाती है.
शाहगढ़ रियासत की स्थापना राजा सुल्तान शाह ने की थी. इस रियासत की स्थापना का भी रोचक इतिहास है. सुल्तान शाह अमेठी राजवंश के राजा विक्रम शाह के भाई थे. गजेटियर में दर्ज इतिहास के अनुसार, एक किले का निर्माण कराया गया था और इसी किले के नाम पर शाहगढ़ का नाम पड़ा.
अमेठी जिले की यह रियासत 121 गांव में फैली हुई थी, जो उस समय समृद्धि, शक्ति और प्रभाव का प्रतीक मानी जाती थी. प्रशासनिक पुनर्गठन और बदलाव के बाद क्षेत्र में धीरे-धीरे बदलाव आता रहा, लेकिन रियासत का रुतबा बरकरार रहा. इसने अंग्रेजों का खूब ध्यान खींचा. कई बार तो उन्हें सीधा दखल देना पड़ा. ऐसा ही एक किस्सा काफी मशहूर है.
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1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उस समय के शासक बलवंत सिंह ने अंग्रेजी सेना और अंग्रेजी सत्ता का समर्थन किया था. इसके इनाम के तौर पर ब्रिटिश सरकार ने उनकी तालुकदारी को सुरक्षित रखा था और उन्हें अपने रियासत पर अधिकार बनाने की अनुमति दी थी. अमेठी राजघराने के इस रियासत से रिश्ते हमेशा सहज नहीं थे.
1803 से 1810 तक शाहगढ़ परगना अमेठी के साथ हरचंद सिंह को पट्टे पर दिया गया था. 1810 में यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई. उस समय इसमें केवल 40 गांव थे. बाद में इसकी सीमा का विस्तार हुआ और 1846 तक गांव की संख्या बढ़कर 60 हो गई. अमेठी के अधीन करने का यह निर्णय उस समय के तत्कालीन शासक बलवंत सिंह को स्वीकार नहीं था. इसके बाद उन्होंने राजा का खुल कर विरोध किया था, जिसके कारण उन्हें राजा लाल माधव सिंह ने गिरफ्तार करवाकर बंदी भी बनवा लिया. उस समय भी यह रियासत काफी चर्चा में रही.
अमेठी जिले के इस रियासत का मामला एक बार ब्रिटिश प्रशासन तक भी पहुंचा था. ब्रिटिश अधिकारी सर विलियम स्लीमन ने लखनऊ में इस प्रकरण को अवध के दरबार में उठाया था. उनके प्रयास से 1855 में बलवंत सिंह को रिहा कर उनकी संपत्ति भी उन्हें वापस दिलाई गई, जो अपने आप में ऐतिहासिक और दिलचस्प घटना थी.
इस रियासत के किले की बनावट ऐतिहासिक और रोचक है. यह किला अपने मजबूत पत्थरों के कारण उस समय के इतिहास और नक्काशी की गवाही देता है. यह किला अपने आप में किसी धरोहर से कम नहीं है.
आज शाहगढ़ का किला और रियासत का वैभव भले ही इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह गए हो, लेकिन सुल्तानपुर गजेटियर में सुरक्षित यह विवरण बताता है कि शाहगढ़ केवल एक किला या जागीर नहीं था, बल्कि अमेठी क्षेत्र की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत का केंद्र था. सुल्तान शाह की ओर से स्थापित इस रियासत ने उत्थान, संघर्ष, सत्ता संघर्ष और सम्मान की रक्षा के अनेक अध्याय देखे. यही कारण है कि शाहगढ़ का इतिहास आज भी इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का विषय है.