Explainer: क्या आग लगने पर लॉक हो जाते हैं इलैक्ट्रॉनिक डोर, ये कैसे काम करते हैं

0
Explainer: क्या आग लगने पर लॉक हो जाते हैं इलैक्ट्रॉनिक डोर, ये कैसे काम करते हैं


लखनऊ में दो दिन पहले अलीगंज के एक एनीमेशन कोचिंग सेंटर में लगी आग के दौरान उसके इलेक्ट्रॉनिक डोर लॉक हो गए थे. इसकी वजह से बच्चे आग और धुएं के बीच कमरे में ही कैद हो गए. इसके बाद इस तरह के डोर पर सवाल उठने लगे. मौजूदा दौर में ज्यादातर आफिसों, शिक्षण संस्थानों के डोर इलेक्ट्रॉनिक ही होते हैं. वो क्या वाकई आग लगने जैसी स्थितियों में लॉक हो सकते हैं.

इसी साल इलेक्ट्रॉनिक दरवाज़ों के ताले जाम होने के कारण जलती इमारतों में दर्जनों लोग अपनी जान गंवा बैठे. जनवरी में दिल्ली के एक घर में लगी आग में छह लोगों की जान चली गई. मार्च में इंदौर में लगी आग में आठ लोग मारे गए. मई में दिल्ली में एक और भीषण आग लगी, जिसमें नौ लोगों की मौत हो गई. जून की शुरुआत दिल्ली के एक होटल में लगी भीषण आग से हुई, जिसमें 21 लोगों की जान चली गई.

2000 के दशक की शुरुआत में कारों के दरवाजों के तालों के साथ यह एक आम समस्या थी. जलती हुई कारों में फंसकर कई लोगों की मौत हो गई थी. लेकिन नियामकों और निर्माताओं ने उस समस्या का समाधान भी कर दिया. अब जब घरों और दफ्तरों में इलेक्ट्रॉनिक ताले लोकप्रिय हो रहे हैं, तो इनके लिए भी जल्द से जल्द कोई समाधान ढूंढना जरूरी है. हालांकि इन डिजिटल तालों के बारे में कहा जाता है कि ये सुरक्षित हैं और आपात हालात में खुद खुल जाते हैं.

आधुनिक सुरक्षा मानकों के अनुसार अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक दरवाजों को इस तरह बनाया जाता है कि फायर अलार्म बजने या बिजली जाने पर वे अपने-आप अनलॉक हो जाएं. फिर भी हर जगह ऐसा हो, ये जरूरी नहीं. बैटरी बैकअप, खराबी या गलत इंस्टॉलेशन के कारण दरवाजा बंद रह सकता है.

क्या इलेक्ट्रॉनिक लॉक खतरनाक हैं?

नहीं. दुनिया भर में एयरपोर्ट, अस्पताल, होटल, मेट्रो स्टेशन और ऑफिसों में लाखों इलेक्ट्रॉनिक दरवाजे लगे हैं. अगर वो सही मानकों के अनुसार लगाए गए हों, तो फायर अलार्म बजते ही अपने-आप खुल जाते हैं. उन्हें बिजली जाने पर भी अनलॉक होने के लिए डिजाइन किया जाता है. उनमें बैटरी बैकअप और इमरजेंसी रिलीज़ सिस्टम होता है. लेकिन हर इलैक्ट्रॉनिक डोर में ये चीजें भी होनी चाहिए
– हर इलेक्ट्रॉनिक डोर में मैनुअल इमरजेंसी ओपनिंग हो.
– फायर अलार्म से उसका खुद अनलॉक होना जरूरी हो.
– लोगों को ये जानकारी दी जाए कि आपातकाल में दरवाजे कैसे खोले जाते हैं.

क्या इलेक्ट्रॉनिक दरवाजे खतरा बन सकते हैं?

कुछ दुर्घटनाओं में ऐसा हुआ है कि खराब डिज़ाइन, रखरखाव की कमी या सुरक्षा नियमों की अनदेखी के कारण इलेक्ट्रॉनिक दरवाजे समय पर नहीं खुले. लोगों के फंसने की वजह बने. इसलिए किसी भी कार्यालय, होटल, मॉल या अपार्टमेंट में यह जानना उपयोगी है कि आपातकालीन निकास कहां हैं. इलेक्ट्रॉनिक लॉक का मैनुअल रिलीज़ कहां है.

वैसे हाल के वर्षों में कुछ आगजनी और आपातकालीन घटनाओं के दौरान इसके लॉक हो जाने से इसको लेकर लोगों का डर बढ़ा है. कई बार ये दरवाजे इन वजहों से भी फेल हो जाते हैं
– बिजली जाने या सिस्टम फेल होने पर दरवाजे बंद हो सकते हैं.
– लोग घबराहट में कार्ड, पासवर्ड या ऐप का इस्तेमाल नहीं कर पाते.
– सॉफ्टवेयर या सेंसर की खराबी लोगों को फंसा सकती है.
– कुछ इमारतों में फायर सेफ्टी नियमों का पालन ठीक से नहीं किया जाता.

भारत में क्यों ज्यादा शिकायत

विदेशों में तो इलैक्ट्रॉनिक डोर को सुरक्षित कर लिया गया है, वो आपात स्थितियों में खुद ब खुद अनलॉक हो जाते हैं. लेकिन भारत में कई हादसों के दौरान ऐसा नहीं हुआ – या इलैक्ट्रॉनिक डोर जाम हो गए या खुल नहीं पाए. इसकी ये वजहें हो सकती हैं
– सस्ते या गैर-मानक सिस्टम लगाना.
– नियमित टेस्टिंग नहीं होना.
– फायर सेफ्टी नियमों का कमजोर पालन.
– कर्मचारियों और लोगों को आपातकालीन प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं होना.

इलैक्ट्रॉनिक डोर कैसा होना चाहिए

– हर इलेक्ट्रॉनिक डोर में अंदर से बिना चाबी के खुलने की सुविधा हो
– फायर अलार्म बजते ही दरवाजे खुद ही अनलॉक हों.
– नियमित मॉक ड्रिल और टेस्टिंग किया जाए.
– आपातकालीन निकास हमेशा खुला और स्पष्ट रूप से चिन्हित हो.

कैसे काम करता है इसका लॉक और अनलॉक

स्मार्ट या इलेक्ट्रॉनिक डोर लॉक को आप एक “डिजिटल दरबान” मान सकते हैं, जो बिना चाबी के सिर्फ आपकी सही पहचान देखकर दरवाजा खोलता है. इसे समझने के लिए मान लीजिए कि इस ताले के पास अपना एक छोटा सा शरीर है, जो तीन मुख्य हिस्सों में काम करता है

1. सेंसर या रीडर यानि इस ताले का “आंख और कान” – यह ताले का वह हिस्सा है जो बाहर दिखाई देता है, जैसे फिंगरप्रिंट स्कैनर, कीपैड या कार्ड रीडर. जैसे ही आप इस पर अंगूठा लगाते हैं, पासवर्ड डालते हैं या मोबाइल पास लाते हैं, यह उसे ‘पढ़’ लेता है. यह बिल्कुल वैसे ही है जैसे घर का दरबान आपकी आवाज़ सुनता है या आपका चेहरा देखता है.

2. कंट्रोल यूनिट यानि ताले का दिमाग – यह ताले के भीतर छिपा एक छोटा कंप्यूटर सर्किट होता है. सेंसर ने जो जानकारी फिंगरप्रिंट या पासवर्ड के जरिए ली, उसे ये दिमाग तुरंत अपनी मेमोरी में सेव डेटा से मैच करता है. यह पलक झपकते ही तय करता है कि सामने वाला व्यक्ति घर का सदस्य है या कोई अजनबी.

3. लॉकिंग मैकेनिज्म यानि डिजिटल ताले का हाथ – ये अमूमन मैग्नेट का होता है, यही वो असली ताकत है जो दरवाजे को लॉक या अनलॉक करती है. जैसे ही दिमाग यानि कंट्रोल यूनिट हरी झंडी देता है कि “हां, बंदा सही है”, वह तुरंत निचले हिस्से को बिजली का करंट भेजता है. करंट मिलते ही मोटर घूमती है और ताले की कुंडी को अंदर खींच लेती है और दरवाजा खुल जाता है. ये पूरा प्रोसेस एक सेकंड में कैसे होता है.

ये किन तरीकों से खुल सकता है?

1. बॉयोमैट्रिक – ये उंगली का निशान स्कैन करता है. सिस्टम मेमोरी में मौजूद रिकॉर्ड से मिलान करता है. मिलान सफल होने पर ताला खुल जाता है.
2. PIN या पासवर्ड – कीपैड पर कोड डालिए. सही कोड होने पर लॉक खुल जाएगा.
3. RFID कार्ड या टैग – होटल, ऑफिस और मेट्रो जैसी जगहों पर ये नॉर्मल इलैक्ट्रॉनिक लॉक होता है, जो कार्ड को रीडर के पास लाने पर खुल जाता है.
4. मोबाइल ऐप या ब्लूटूथ – स्मार्टफोन से कमांड भेजी जाती है. कुछ लॉक Wi-Fi या इंटरनेट से भी नियंत्रित की जा सकती है.
5. फेस रिकग्निशन – कैमरा चेहरे को पहचानता है. पहचान सही होने पर लॉक खुल जाता है.
6. पारंपरिक चाबी – कई इलेक्ट्रॉनिक लॉक में बैकअप के रूप में सामान्य चाबी भी होती है.

आग लगने पर क्या होता है?

अच्छी तरह डिज़ाइन किए गए इलैक्ट्रॉनिक डोर लॉक सिस्टम में फायर अलार्म सक्रिय होते ही ये दरवाजे खुद ही खुल जाते हैं. अंदर से पुश-बार या इमरजेंसी रिलीज़ से दरवाजा खोला जा सकता है. बैटरी बैकअप कुछ समय तक सिस्टम को चालू रखता है.



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *