आगरा में है दुनिया का सबसे बड़ा ‘भालू घर’, जहां ठाठ-बाट से रहते है भालू!

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आगरा में है दुनिया का सबसे बड़ा ‘भालू घर’, जहां ठाठ-बाट से रहते है भालू!


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Bear Rescue Centre Agra: आगरा में दुनिया का सबसे बड़ा और पुराना ‘भालू संरक्षण केंद्र’ भी है, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. कीठम झील के पास बने इस खास सेंटर में देश भर से बचाए गए 85 भालुओं को नई जिंदगी मिली है. यहां भालुओं के लिए शानदार अस्पताल, नहाने के लिए तालाब और गर्मियों में उनके कमरों में कूलर तक की व्यवस्था है. सिर्फ यही नहीं, भालू का खेल दिखाने वाले मदारी परिवारों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उनके बच्चों को मुफ्त शिक्षा और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम भी यह सेंटर कर रहा है.

आगरा: उत्तर प्रदेश के आगरा को पूरी दुनिया में केवल ताजमहल और पेठे के लिए जाना जाता है. लेकिन बहुत कम लोग यह जानते हैं कि इसी आगरा में विश्व का सबसे बड़ा और सबसे पुराना भालू संरक्षण केंद्र (Bear Rescue Centre) भी है. आगरा के सिकंदरा से कुछ ही किलोमीटर दूर रुनकता क्षेत्र की खूबसूरत कीठम झील के पास यह सेंटर बना हुआ है, जहां पूरे भारत से रेस्क्यू किए गए भालुओं को लाकर सुरक्षित रखा जाता है. वाइल्ड लाइफ एसओएस (Wildlife SOS) का स्टाफ इन भालुओं की चौबीसों घंटे पूरी लगन से देखरेख करता है.

दरअसल, एक दौर था जब भारत में भालुओं का नाच और खेल दिखाना आम बात थी. उस समय मदारी (कलंदर) अपने रोजगार के लिए भालुओं के साथ काफी क्रूरता करते थे, जैसे उनकी नाक में छेद करके रस्सी फंसाना और उन्हें भूखा रखना. इसी दर्द से भालुओं को मुक्ति दिलाने के लिए साल 1999 में उत्तर प्रदेश वन विभाग के सहयोग से वाइल्डलाइफ एसओएस द्वारा इस केंद्र की स्थापना की गई थी. यहां पहला भालू साल 2002 में लाया गया था और आज वर्तमान में 85 भालू इस सुरक्षित आशियाने में आराम से रह रहे हैं.

भालुओं के कमरों में कूलर, खुद का अस्पताल और स्पेशल डाइट
वाइल्डलाइफ एसओएस में कंजर्वेशन प्रोजेक्ट के डायरेक्टर बैजू राज एम.वी. ने बताया कि पूरे भारत में कुल चार भालू संरक्षण केंद्र हैं, जो आगरा, बेंगलुरु, भोपाल और पश्चिम बंगाल में स्थित हैं. इनमें से आगरा का सेंटर सबसे पुराना और बड़ा है.
यहां रहने वाले भालुओं को इंसानों जैसी वीआईपी सुविधाएं मिलती हैं. उनके रहने के लिए बकायदा पक्के कमरे बने हुए हैं, जिनमें गर्मियों के मौसम में ठंडी हवा के लिए कूलर लगाए जाते हैं. खेलने और नहाने के लिए केंद्र के अंदर ही कई छोटे-छोटे तालाब बनाए गए हैं. भालुओं के खान-पान का एक सख्त टाइमटेबल है. सुबह के समय उन्हें बेहद पौष्टिक दलिया दिया जाता है. इसके अलावा खजूर, नारियल और ताजे मौसमी फल उनके भोजन का हिस्सा हैं. गर्मियों में भालुओं को गर्मी से राहत देने के लिए खास तौर पर फलों को बर्फ में जमाकर ‘फ्रूट-आइसक्रीम’ के रूप में दिया जाता है. सेंटर के अंदर ही भालुओं का अपना एक अत्याधुनिक अस्पताल है, जहां अनुभवी डॉक्टरों की टीम उनके हर छोटे-बड़े जख्म और बीमारी का इलाज करती है.

मदारी परिवारों को मिला शिक्षा और रोजगार का तोहफा
डायरेक्टर बैजू राज ने एक बेहद खूबसूरत बात साझा करते हुए बताया कि शुरुआत में कलंदर (मदारी) समुदाय के लोगों से भालुओं को मुक्त कराना एक बड़ी चुनौती थी, क्योंकि वे बेहद गरीब थे और भालू का खेल दिखाकर ही उनका घर चलता था.
संस्था ने उनके दर्द को समझा और उन्हें भरोसा दिलाया कि भालू सौंपने के बाद उनका रोजगार नहीं छिनेगा. आज इस एनजीओ की मदद से भालू देने वाले मदारी परिवारों के बच्चों को बिल्कुल मुफ्त और अच्छी शिक्षा दी जा रही है. इसके साथ ही, घर की महिलाओं और बच्चियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई-कढ़ाई का काम सिखाया जा रहा है, ताकि वे सम्मान के साथ समाज की मुख्यधारा में जुड़ सकें और अपना जीवन यापन आसानी से कर सकें.

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Seema Nath

सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें



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