गरीबी, ताने और आंसू…फिर भी नहीं टूटीं ये बेटियां! दंगल में रच रही हैं इतिहास

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गरीबी, ताने और आंसू…फिर भी नहीं टूटीं ये बेटियां! दंगल में रच रही हैं इतिहास


सहारनपुर: सहारनपुर की गलियों से निकलकर दो बेटियों ने अपने पिता के उस सपने को जिंदा कर दिया है, जो कभी हालातों की वजह से अधूरा रह गया था. ये कहानी गंगोह विधानसभा के गांव बाल्लू की है. यहां माजिद नाम के शख्स ने अपने खेत को अखाड़ा बना दिया और अपनी दो बेटियों आरज़ू और आयशा को पहलवान बना दिया.

आरजू 14 और आयशा 13 साल की है. दोनों ही पढ़ाई के साथ- साथ प्रतिदिन अखाड़े में 5 से 8 घंटे तक पसीना बहाती हैं. जिस समाज में पर्दे की दीवारें लड़कियों के लिए बनाई जाती हैं, वहां माजिद ने उस दीवार को गिरा कर बेटियों के लिए अखाड़ा तैयार किया. खुद भी कभी कुश्ती के दांव आजमा चुके माजिद का सपना था कि वे देश के लिए खेलें, लेकिन मां की मौत और गरीबी ने उन्हें मजबूर कर दिया. अब वो सपना उनकी बेटियां जी रही हैं.

5 राज्यों के दंगल में भाग ले चुकी है आरजू- आयशा
माजिद बताते हैं कि शुरुआत में गांव के लोग ताने मारते थे. कहते थे कि लड़कियों को कुश्ती कराते हो, शर्म नहीं आती? लेकिन, माजिद ने किसी को न जवाब दिया, न गुस्सा किया. बस चुपचाप अखाड़े की मिट्टी में बेटियों को दांव- पेंच सिखाते रहे. उनकी मेहनत रंग भी लाई. आरजू और आयशा अब तक 5 राज्यों में 50 से ज्यादा दंगल में भाग ले चुकी हैं और कई मेडल भी जीत चुकी हैं.

देश के लिए मेडल लाने का है सपना
आरजू ने लोकल18 से बात करते हुए बताया, “पापा का सपना हम पूरा करेंगे. वो देश के लिए नहीं लड़ सके, अब हम लड़ेंगे. हमें कुश्ती पसंद है और हम ओलंपिक में मेडल लाना चाहते हैं.”

अखाड़े में प्रतिदिन करती हैं प्रैक्टिस
वो बताती हैं कि हफ्ते में दो बार सहारनपुर शहर के स्टेडियम में जाकर भी ट्रेनिंग करती हैं. माजिद अब सिर्फ पिता नहीं, कोच भी हैं. सुबह से शाम तक मज़दूरी करते हैं और फिर खेत में जाकर बेटियों की प्रैक्टिस करवाते हैं. उन्होंने खेत के एक कोने को अखाड़ा बना दिया है. उन्हें किसी तरह की कोई सरकारी मदद नहीं मिली. उनके पास ना तो महंगे जूते हैं, न ही मैट या स्पॉन्सर, लेकिन जोश और जुनून है, जो किसी भी सुविधा से बड़ा होता है.

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माजिद ने दी प्रतिक्रिया
माजिद कहते हैं, “लोग क्या कहते हैं, अब फर्क नहीं पड़ता. मेरी बेटियां मेरी शान हैं. वो मेरी पहचान बनेंगी. मैं चाहता हूं कि वो ओलंपिक में भारत का झंडा लहराएं.”

इस संघर्ष और जुनून की कहानी बताती है कि अगर सपनों में जान हो, तो मिट्टी से भी सोना निकलता है. सहारनपुर की ये बेटियां आने वाले कल की चैंपियन हैं, जो सिर्फ अपने पिता का ही नहीं, पूरे देश का नाम रोशन करने निकली हैं.



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