फर्रुखाबाद के किसानों ने बदला खेती का तरीका, लीची और ढकाऊ पद्धति से कर रहे कमाल; हो रही लाखों की कमाई

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फर्रुखाबाद के किसानों ने बदला खेती का तरीका, लीची और ढकाऊ पद्धति से कर रहे कमाल; हो रही लाखों की कमाई


फर्रुखाबाद: जिले के किसान अब परंपरागत खेती के बजाय नई तकनीकों और स्मार्ट तरीकों से खेती को न केवल आसान बना रहे हैं, बल्कि अच्छी आमदनी भी कर रहे है. खास बात यह है कि किसान अब लीची की खेती की ओर रुख कर रहे हैं, जो मात्र 6 साल में तैयार होकर लाखों का मुनाफा दे रही है. इसके साथ ही सब्जियों की खेती में भी ढकाऊ पद्धति का उपयोग कर नई मिसाल पेश की जा रही है.

फर्रुखाबाद के किसान अब लीची की खेती को अपनाकर पारंपरिक खेती से कहीं ज्यादा मुनाफा कमा रहे है. किसानों का कहना है कि एक लीची बागान तैयार करने में लगभग 8,000 रुपये की लागत आती है, लेकिन फसल तैयार होने पर लाखों रुपये की आमदनी होती है. इसके साथ ही इस फसल की बाजार में भारी मांग भी बनी रहती है.

लीची में भरपूर पोषक तत्व
कमालगंज सीएचसी के डॉक्टर विकास पटेल ने बताया कि लीची में भरपूर पोषक तत्व होते है. यह न सिर्फ शरीर की इम्यूनिटी बढ़ाती है, बल्कि गर्मी में ठंडक भी देती है. सीमित अवधि में लीची का सेवन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है.

सब्जियों में प्रयोग हो रही “ढकाऊ पद्धति
जिले के कई किसानों ने सब्जियों की फसलों में नई तकनीक ‘ढकाऊ पद्धति’ अपनाई है, जिससे उन्हें कम लागत में बेहतर उत्पादन मिल रहा है. किसान बताते हैं कि इस पद्धति के जरिए फसलों को कीट और बीमारियों से बचाव, कम सिंचाई में बेहतर अंकुरण और जलवायु के प्रभाव से सुरक्षा मिलती है.

क्या है ढकाऊ पद्धति?
किसानों के मुताबिक, सबसे पहले खेत को समतल किया जाता है और हर दो मीटर पर क्यारियां बनाई जाती है. इसके बाद लंबाई में पॉलीथिन की सहायता से तंबू आकार का ढांचा तैयार किया जाता है, जिसके नीचे बीज बोए जाते है. इस तकनीक से फसल को मौसम की मार से बचाया जा सकता है, और समय से पहले तैयार कर मंडी में भेजा जा सकता है.

50 से 80 किलो तक उत्पादन
एक किसान ने बताया कि उन्होंने यह पद्धति एक यात्रा के दौरान सीखी थी और अब अपने खेत में सफलतापूर्वक प्रयोग कर रहे हैं। इस तकनीक से तैयार आलू बुखारा का एक पौधा 50 से 80 किलो तक उत्पादन देता है, जिससे किसानों को भारी मुनाफा हो रहा है.

खेती का तरीका
सब्जी की फसलों के लिए नमीदार भूमि का चयन किया जाता है. खेत को समतल करने के बाद जैविक खाद मिलाई जाती है और क्यारियां बनाकर बीज बो दिए जाते है. नियमित सिंचाई और देखरेख से फसल अच्छी तरह तैयार होती है, जिसे बाद में स्थानीय मंडियों में बेचा जाता है.फर्रुखाबाद के किसान यह साबित कर रहे है कि अगर सोच बदली जाए और नई तकनीकों को अपनाया जाए, तो खेती न सिर्फ फायदे का सौदा है, बल्कि यह आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक मजबूत कदम भी बन सकती है.



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