मैं इग्लिश मास्टर्स हूं, लेकिन फल बेच रहा हूं… 21000 शिक्षकों की कहानी, जो हो गए बेरोजगा

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मैं इग्लिश मास्टर्स हूं, लेकिन फल बेच रहा हूं… 21000 शिक्षकों की कहानी, जो हो गए बेरोजगा


लखनऊः मदरसा आधुनिकीकरण योजना को बंद हुए लगभग पांच साल हो गए हैं. इसके बंद होने से करीब 21000 शिक्षक बेसहारा हो गए हैं. आलम यह है कि अब उन्हें पढ़ाने की जगह कोई और रोजगार करना पड़ रहा है. ऐसी ही कहानी है कई मदरसा शिक्षकों की, जो अब फल बेच रहे हैं तो कोई रिक्शा चला रहा है. ऐसे ही हैं 56 वर्षीय मोहम्मद मुस्लिम, जो इंग्लिश में मास्टर्स हैं. लेकिन अब वह अपना गुजारा ठेले पर फल बेचकर कर रहे हैं. हालांकि अभी भी इन हजारों शिक्षकों को उम्मीद है कि सब ठीक हो जाएगा. वहीं इस पूरे मामले को लेकर उत्तर प्रदेश के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने कहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ हुई बैठक में लिए गए फैसले के बाद राज्य सरकार इन मॉडर्न टीचरों को समायोजित करने पर विचार कर रही है. अंसारी ने कहा कि जल्द ही एक डिटेल वर्क प्लान तैयार किया जाएगा और उन्होंने यह भी कहा कि जिन शिक्षकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है, उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जाएगा.

मदरसा आधुनिकीकरण के जरिए बच्चों को मुख्यधारा में लाने की कोशिश
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक गाजीपुर निवासी मुस्लिम जैसे शिक्षकों ने आधुनिकीकरण योजना के तहत राज्य भर के 7,442 मदरसों में लगभग 10 लाख छात्रों को हिंदी, इंग्लिश, मैथ्स, साइंस और सोशल साइंस जैसे सब्जेक्ट पढ़ाए. इस योजना का उद्देश्य मदरसों में मुख्यधारा और धार्मिक शिक्षा के बीच एक ब्रिज का काम करना था. इन शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था मदरसा आधुनिकीकरण शिक्षक एकता समिति के अध्यक्ष अशरफ अली का कहना है कि सरकार की इस तरह की पहल से न केवल शिक्षकों को बल्कि छात्रों को भी लाभ होगा.

कोई सिलाई कर रहा तो कोई चला रहा रिक्शा
अली बताते हैं कि इस योजना के लागू होने के बाद मदरसों के छात्र मुख्यधारा की शिक्षा में आसानी से प्रवेश कर सकेंगे. उन्होंने यह भी कहा कि पहले उन्हें अन्य स्कूलों में प्रवेश पाना मुश्किल होता था. शिक्षकों का कहना है कि वेतन भले ही कम था, लेकिन उससे उन्हें सहारा मिलता था. वेतन बंद होने के बाद भी, कई शिक्षक इस उम्मीद में मदरसों में काम करते रहे कि उनका बकाया जल्द ही चुका दिया जाएगा. इसके साथ-साथ, कई शिक्षकों ने अपने परिवारों का भरण-पोषण करने के लिए फेरीवाला, सिलाई, रिक्शा चालक और खेती जैसे छोटे-मोटे काम भी किए.

‘सभी डिग्रियां होने के बावजूद फल बेचने को मजबूर हूं’
मुस्लिम बताते हैं कि वे गाजीपुर के मदरसा कादरिया गुलशन में सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक 53 छात्रों को अंग्रेजी, हिंदी और सामाजिक विज्ञान पढ़ाते थे और दिन में बाद में फल बेचते थे. अब फल बेचना ही उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है. उन्होंने कहा, “अपने परिवार, पत्नी और चार बेटियों का भरण-पोषण करना मुश्किल हो गया है. पत्नी ने सिलाई का काम शुरू कर दिया है. आज मास्टर्स डिग्री, प्राथमिक शिक्षा में स्नातक और बुनियादी प्रशिक्षण प्रमाणपत्र होने के बावजूद, मैं सड़क किनारे फल बेचता हूँ.”

‘प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं अधिकारी’
मंत्री अंसारी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि सरकार उन लोगों को समायोजित करने के तरीकों पर विचार कर रही है, जो पहले आधुनिक शिक्षक के रूप में काम करते थे और अल्पसंख्यक मामलों के विभाग के निदेशक और प्रधान सचिव को उनके समायोजन के लिए एक नीति बनाने का निर्देश दिया गया है. अंसारी ने कहा कि अधिकारी फिलहाल प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं.

मदरसा आधुनिकीकरण किसका था सपना?
मदरसा आधुनिकीकरण योजना की परिकल्पना 1993-94 में पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा की गई थी. वहीं साल 2008 में इसका नाम बदलकर मदरसों में प्रोवाइडिंग क्वालिटी एजुकेशन योजना कर दिया गया. यह योजना केवल मुस्लिम शिक्षकों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें मदरसों में अधिकतम तीन “आधुनिक शिक्षकों” की नियुक्ति का प्रावधान था.

मॉडर्नाइज मदरसा शिक्षकों को कितनी मिलती थी सैलरी
इस योजना के तहत केंद्र और राज्यों को इन शिक्षकों का वेतन 60:40 के अनुपात में देना था, जिसमें स्नातक शिक्षकों को 6,000 रुपये प्रति माह और स्नातकोत्तर डिग्री धारक शिक्षकों को 12,000 रुपये प्रति माह मिलते थे. हालांकि, इस योजना के तहत वेतन भुगतान हमेशा अनियमित रहा. साल 2016 में, उत्तर प्रदेश में तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार ने दोनों श्रेणियों के शिक्षकों के मानदेय में क्रमशः 2,000 रुपये और 3,000 रुपये की वृद्धि की.

2024 में यूपी सरकार ने मानेदय का भुगतान भी किया बंद
अप्रैल 2021 में, इस योजना को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से अल्पसंख्यक मामलों के केंद्रीय मंत्रालय को सौंप दिया गया और इसके तुरंत बाद, इसे बंद कर दिया गया. अशरफ कहते हैं, “2020-21 में सरकार ने आधुनिक शिक्षकों को 10 महीने तक वेतन दिया. इससे उम्मीदें फिर से जगीं. लेकिन फिर वेतन का भुगतान बंद हो गया.” साल 2024 में उत्तर प्रदेश सरकार ने मानदेय का भुगतान भी बंद कर दिया. शाकिर अली और उनकी पत्नी उन “आधुनिक शिक्षकों” में से हैं जो कक्षाएं लेने के लिए आते रहते हैं और कई मदरसा समितियां ऐसे शिक्षकों को मामूली वेतन पर नियुक्त रखती हैं.

पहले रिक्शा चलाया फिर प्राइवेट ट्यूशन
अली, जो गाज़ीपुर के मोहम्मदपुर इलाके में स्थित मदरसा जामिया अबुल गौस में अंग्रेजी और गणित पढ़ाते हैं. पहले किराए का ई-रिक्शा चलाते थे और अब निजी ट्यूशन देते हैं. उनकी पत्नी, जो ग्रेजुएट हैं. वह उसी मदरसे में कार्यरत हैं, जहां लगभग 300 छात्र पढ़ते हैं. यहां तीन आधुनिक शिक्षक हैं, साथ ही धार्मिक शिक्षा के लिए नौ शिक्षक हैं.

‘हमें लगा हमारी स्थिति सुधर गई, लेकिन फिर…’
आजमगढ़ के मीरापुर गांव की निवासी लाइका फातिमा भी मामूली वेतन पर एक मदरसे में पढ़ाना जारी रखे हुए हैं. उनका कहना है कि मैनेजमेंट और छात्रों ने उनसे बने रहने का अनुरोध किया था. देवैत गांव के मदरसा नेयाज़ जाफरी में, जहां वह पढ़ाती हैं, वहां 138 बच्चे हैं और तीन आधुनिक शिक्षक हैं. समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर लाइका कहती हैं कि उन्होंने 2016 में काम शुरू किया था. उस समय उनके पति नसीम हैदर की नौकरी चली गई थी. हैदर को बाद में एक निजी टैक्सी चालक के रूप में काम मिल गया और कुछ समय के लिए परिवार को लगा कि उनकी स्थिति सुधर गई है. लेकिन जब हमारी तनख्वाह बंद हो गई, तो हम फिर से आर्थिक तंगी में डूब गए. इसलिए परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उसने स्कूल के बाद कपड़े सिलना शुरू कर दिया.



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