विकास की कीमत? आगरा में सूखते कुएं और गिरता जलस्तर बना बड़ी चिंता, जानिए वजह

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विकास की कीमत? आगरा में सूखते कुएं और गिरता जलस्तर बना बड़ी चिंता, जानिए वजह


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आगरा, जो कभी अपने ऊंचे भूजल स्तर और पारंपरिक कुओं के लिए जाना जाता था, आज गंभीर जल संकट से जूझ रहा है. समय के साथ बढ़ते शहरीकरण, बोरवेल और सबमर्सिबल के अत्यधिक उपयोग, यमुना नदी के प्रदूषण और आरओ सिस्टम से पानी की बर्बादी ने भूजल स्तर को तेजी से नीचे पहुंचा दिया है. इसका सबसे बड़ा असर शहर के पुराने कुओं पर पड़ा, जो अब इतिहास बनकर रह गए हैं.

उत्तर प्रदेश का आगरा एक प्राचीन शहर है, जो यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है. एक समय यह क्षेत्र ऊंचे जलस्तर के लिए जाना जाता था. पहले आगरा के हर गांव में कुएं होते थे और ग्रामीण जीवन पूरी तरह इन्हीं कुओं के पानी पर निर्भर था. पीने से लेकर दैनिक जरूरतों तक हर कार्य के लिए कुएं का पानी उपयोग में लाया जाता था. लेकिन समय के साथ जलस्तर में गिरावट और पर्यावरणीय बदलाव के कारण कुएं धीरे-धीरे सूखते गए और अब अधिकांश कुएं विलुप्त हो चुके हैं.

आगरा में समय और विकास के साथ धीरे-धीरे सबमर्सिबल और बोरवेल का चलन तेजी से बढ़ गया. शहर के अधिकतर घरों में अब सबमर्सिबल और बोरवेल की व्यवस्था हो गई है. पहले जहां यह सुविधा केवल शहरी इलाकों तक सीमित थी, वहीं बाद में यह गांव और देहात तक भी पहुंच गई. घरों और खेतों में सीधे और आसानी से पानी उपलब्ध कराने के लिए सबमर्सिबल पंपों का उपयोग बढ़ता गया, जिसके कारण उथले कुएं धीरे-धीरे सूखने लगे और कई स्थानों पर पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच गए.

आगरा में जल जीवन मिशन के तहत तेजी से कार्य किया गया. इस योजना और स्थानीय जलकल विभाग की पाइपलाइन व्यवस्था के जरिए घर-घर पानी की आपूर्ति शुरू हुई. इससे लोगों को अब घर बैठे ही नल के माध्यम से पानी मिलने लगा, जिसके कारण कुओं पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो गई और उनका उपयोग लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुंच गया.

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आगरा में एक समय जलस्तर काफी ऊपर हुआ करता था, लेकिन समय के साथ इसमें लगातार गिरावट दर्ज की गई. स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार आगरा और आसपास के कई ब्लॉक अत्यधिक जल दोहन की श्रेणी में आ गए, जिसके कारण पानी की कमी बढ़ने लगी और क्षेत्रीय कुएं सूखने लगे. जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे जाता गया, कुओं में पानी की मात्रा भी घटती गई और धीरे-धीरे ये पूरी तरह सूखकर उपयोग से बाहर हो गए.

आगरा में धीरे-धीरे विकास ने रफ्तार पकड़ी, लेकिन इसके साथ कई प्राकृतिक नुकसान भी देखने को मिले. शहर में बड़े पैमाने पर सड़कों, मकानों और व्यावसायिक परिसरों के निर्माण के कारण बारिश का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पाता, जिससे भूजल रिचार्ज का प्राकृतिक चक्र प्रभावित हो गया. इसी वजह से कुओं में पानी भरने की प्रक्रिया बाधित हुई और वे धीरे-धीरे सूखकर विलुप्त होने लगे.

आगरा में जब जलस्तर धीरे-धीरे कम होने लगा, तब लोगों ने कुओं की ओर ध्यान देना भी कम कर दिया. इसके चलते कई कुएं कचरा और गंदगी से भरने लगे. स्थानीय निकायों, समितियों और आम जनता द्वारा ऐतिहासिक एवं पारंपरिक कुओं के रख-रखाव और सफाई पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिससे वे मलबे और गाद से भरते चले गए और अंततः पूरी तरह बर्बाद होकर विलुप्त हो गए.

आगरा शहर यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है. एक समय था जब यमुना का जलस्तर काफी अच्छा और प्रवाह तेज हुआ करता था. लेकिन समय के साथ नदी के पानी में कमी आने लगी और यमुना प्रदूषण की चपेट में आकर मैली होती चली गई. इतिहासकारों के अनुसार आगरा का भूजल स्तर यमुना के जल-प्रवाह से गहराई से जुड़ा हुआ है. ऐसे में यमुना में बढ़ते प्रदूषण और घटते जल प्रवाह का असर आसपास के क्षेत्रों के भूजल पर भी पड़ा, जिससे कई जगहों पर कुओं का जलस्तर गिरता गया और वे सूखने की स्थिति में पहुंच गए.

आगरा में समय के साथ घर-घर में आरओ (RO) प्लांट लगने लगे. पानी की गुणवत्ता को लेकर चिंता बढ़ने के कारण लोगों ने तेजी से आरओ सिस्टम अपनाना शुरू कर दिया. हालांकि, आरओ प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है, जिससे जल की खपत बढ़ गई और भूजल स्तर पर दबाव भी पड़ा. माना जाता है कि इस बढ़ती पानी की बर्बादी ने भी आगरा में जल संकट को गहरा किया और कुओं के धीरे-धीरे विलुप्त होने में एक कारण के रूप में योगदान दिया.

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